राजनीति

अलास्का शिखर बैठक के बाद क्या?

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अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच अलास्का में बैठक हुई। बैठक के पहले अमरीकी राष्ट्रपति पत्रकारों से बात करते हुए रूसी राष्ट्रपति को चेतावनी और धमकी

इजरायल द्वारा गाजापट्टी में जारी क्रूर नरसंहार

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इजरायली यहूदी नस्लवादी बेंजामिन नेतन्याहू की हुकूमत ने नये सिरे से गाजा शहर और समूची गाजापट्टी में अपने व्यापक विनाश और नरसंहार को और ज्यादा तेज कर दिया है। इजरायली शासक

पीड़िता ही दोषी

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स्त्री विरोधी सोच किस कदर हमारे समाज में पसरी हुई है इसका एक हालिया उदाहरण गुजरात से सामने आया है। स्त्री विरोधी सोच कोई गुपचुप तरीके से जाहिर नहीं की गयी बल्कि चौराहे-सड़

‘‘माननीय’’ पूर्व सांसद को उम्र कैद

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यौन उत्पीड़न के बहुचर्चित मामले में प्रज्वल रेवन्ना को 1 अगस्त को विशेष अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है। कुछ समय पहले तक ‘‘माननीय’’ रहे अब कैदी संख्या में बदल गये हैं। ज

अमेरिकी तटकर और भारत का शासक वर्ग

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ट्रम्प द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत तटकर थोपने के बाद से भारत सरकार सकते में है। मोदी के प्रिय मित्र ट्रम्प द्वारा किये गये इस व्यवहार से बड़बोले मोदी-शाह को सांप सूंघ गया है

धर्मस्थला मंदिर और रसूखदार लोग

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कर्नाटक में धर्मस्थला के आस-पास कत्ल करके सैकड़ों लाशें दफनाई गई हैं। इस बात के खुलासे ने लोगों का दिल दहला दिया है। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में धर्मस्थला नामक शिव का

धराली आपदा : पूंजीवादी विकास का भयानक मंजर

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उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली, हर्षिल और सूक्खी गांव भयानक आपदा के शिकार बने हैं। 4 अगस्त की दोपहर को पहाड़ से तेज बहाव के साथ मलवा-गाद ने गांव के एक हिस्से को पूरी

सत्ता पक्ष और विपक्ष : खोटे सिक्के के दो पहलू

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अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि केन्द्र व विभिन्न राज्यों में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भारत के मजदूरों व मेहनतकश किसानों, शोषित-उत्पीड़ित जनों के हितों के अनुसार देश को

जनतंत्र से जन को बाहर करने की साजिश

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यह याद रखना होगा कि अपने पूंजीवादी जनतंत्र में पूंजीपति वर्ग ने आम जन को बहुत मजबूरी में दाखिल होने दिया था। उसने हर कदम पर प्रतिरोध किया था। केवल आम जन के तीखे संघर्षों के दबाव में ही वह क्रमशः पीछे हटा था। पीछे हट कर भी वह हमेशा असुविधा महसूस करता रहा। जनतंत्र में आम जनों के प्रवेश के बाद उनसे निपटने के लिए कभी फासीवाद की शरण लेता रहा तो कभी जनतंत्र को एकदम खोखला, औपचारिक बनाता रहा। अब फासीवादियों के एक बार फिर उभार के दौर में वह आम जन को भांति-भांति से जनतंत्र से बाहर करने की कोशिश कर रहा है। 

केन्या में गहराता संकट, बढ़ता दमन और प्रतिरोध

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विलियम रूटो केन्या के राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपतित्व काल में केन्या की मजदूर-मेहनतकश आबादी की हालत खराब होती गयी है। वहां बेरोजगारी 67 प्रतिशत के आस-पास है। रूटो 2023

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।