अमेरिकी साम्राज्यवादियों की बदहवासी और उनका भदेस नेता
अस्तु, अमरीकी साम्राज्यवादी इस समय जो कुछ कर रहे हैं वह नया नहीं है। तब फिर कुछ लोगों को यह नया क्यों लग रहा है? क्यों उन्हें साम्राज्यवाद की वापसी होती दीख रही है?
अस्तु, अमरीकी साम्राज्यवादी इस समय जो कुछ कर रहे हैं वह नया नहीं है। तब फिर कुछ लोगों को यह नया क्यों लग रहा है? क्यों उन्हें साम्राज्यवाद की वापसी होती दीख रही है?
आजादी के बाद देश में पूंजीवादी विकास के चलते 1980-90 के दशक तक गांवों-कस्बों का जो स्वरूप उभरा वह अत्यन्त अजीबो-गरीब था। वह एक साथ विकास के होने और न होने दोनों को व्यक्त करता था। इसमें सामंती मूल्य-मान्यताएं और आचार-विचार अत्यन्त उलझे हुए तरीके से पूंजीवादी महत्वाकांक्षाओं से तालमेल बैठाये हुए थे। उपभोक्तावादी सामानों से लबरेज दहेज की मांग और पूर्ति इसका उदाहरण है।
वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे।
मैकालेपुत्र शब्द हिन्दू फासीवादियों का प्रिय शब्द है। वे अक्सर ही इसका इस्तेमाल करते रहते हैं, खासकर अपने विरोधी उदारवादियों के लिए। अभी हाल ही में संघी प्रधानमंत्री ने ए
फासीवादी हमेशा से ही ‘महामानव’ और ‘लघु मानव’ में विश्वास करते रहे हैं। उनका नेता महामानव होता है और लघु मानवों की भीड़ को उसके पीछे चलना होता है। यदि नरेन्द्र मोदी खुद को अजैविक मानते हैं तथा उनके भक्त उन्हें अवतारी पुरुष मानते हैं तो यह अनायास नहीं है। यह फासीवादियों की आम दृष्टि के अनुरूप है।
केन्द्र की संघी भाजपा सरकार ने 7 नवम्बर, 2025 से अगले एक साल तक बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित गीत ‘वन्दे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम क
संघी ठीक इसी वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या उसका मन माफिक इस्तेमाल करते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि आज की वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा वेदों में आधुनिक विज्ञान को नहीं ढूंढा जा सकता। इसी तरह आज की वैज्ञानिक पद्धति से प्राचीन भारत में परमाणु बम, मिसाइल या हवाई जहाज के अस्तित्व को नहीं प्रमाणित किया जा सकता। इसीलिए वे अपनी सुविधानुसार इस वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या तोड़ते-मरोड़ते हैं। और कोई चारा न होने पर ये सापेक्षिकतावादी या संदेहवादी रुख अख्तियार कर लेते हैं। आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति को संदेह के दायरे में लाकर ये अपनी बेसिर-पैर की बातों को जायज ठहराने का प्रयास करते हैं।
उपभोक्तावाद के इस दौर में तब भी इंसान ही उपभोक्ता सामानों का मालिक होता था और उनकी हैसियत से अपनी हैसियत हासिल करता था। एक सीमित अर्थ में ही ये सामान इंसानों के मालिक होते थे। जब किसी की हैसियत किसी दूसरे से तय होने लगे तो दूसरा स्वभावतः ही एक अर्थ में पहले वाले का मालिक होने लगता है। दूसरा पहले को चलाने लगता है। उपभोक्तावादी सामान इंसानों के जीवन की गति को तय करने लगते हैं।
चरखे और हथकरघे ने देश के सूती कपड़ा उद्योग तथा उसके उपभोग पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डाला। इसका जो भी प्रभाव पड़ा वह राजनीतिक था। इसने आजादी की लड़ाई के प्रतीक का स्थान ग्रहण कर लिया। इसने जन-जन तक यह संदेश पहुंचाया कि यदि देश के लोगों के आर्थिक हालात खराब हैं तो उसका कारण विदेशी शासन है। हर जगह खादी में नजर आने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता इस भावना को मूर्त रूप में संचारित करते थे।
नेपाल की हालिया घटनाओं के बाद उदारवादी और वाम-उदारवादी एक स्वर से कह रहे हैं कि हमारे यहां ऐसा नहीं हो सकता। इसके लिए भांति-भांति के तर्क दिये जा रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।