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एक बार फिर लोकतंत्र और भीड़तंत्र

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फासीवादी हमेशा से ही ‘महामानव’ और ‘लघु मानव’ में विश्वास करते रहे हैं। उनका नेता महामानव होता है और लघु मानवों की भीड़ को उसके पीछे चलना होता है। यदि नरेन्द्र मोदी खुद को अजैविक मानते हैं तथा उनके भक्त उन्हें अवतारी पुरुष मानते हैं तो यह अनायास नहीं है। यह फासीवादियों की आम दृष्टि के अनुरूप है। 

‘वन्दे मातरम्’ और भाजपा का साम्प्रदायिक एजेण्डा

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केन्द्र की संघी भाजपा सरकार ने 7 नवम्बर, 2025 से अगले एक साल तक बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित गीत ‘वन्दे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम क

नयी शिक्षा नीति के भूत-प्रेत

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संघी ठीक इसी वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या उसका मन माफिक इस्तेमाल करते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि आज की वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा वेदों में आधुनिक विज्ञान को नहीं ढूंढा जा सकता। इसी तरह आज की वैज्ञानिक पद्धति से प्राचीन भारत में परमाणु बम, मिसाइल या हवाई जहाज के अस्तित्व को नहीं प्रमाणित किया जा सकता। इसीलिए वे अपनी सुविधानुसार इस वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या तोड़ते-मरोड़ते हैं। और कोई चारा न होने पर ये सापेक्षिकतावादी या संदेहवादी रुख अख्तियार कर लेते हैं। आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति को संदेह के दायरे में लाकर ये अपनी बेसिर-पैर की बातों को जायज ठहराने का प्रयास करते हैं।

चतुर मशीनें और बुद्धू इंसान

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उपभोक्तावाद के इस दौर में तब भी इंसान ही उपभोक्ता सामानों का मालिक होता था और उनकी हैसियत से अपनी हैसियत हासिल करता था। एक सीमित अर्थ में ही ये सामान इंसानों के मालिक होते थे। जब किसी की हैसियत किसी दूसरे से तय होने लगे तो दूसरा स्वभावतः ही एक अर्थ में पहले वाले का मालिक होने लगता है। दूसरा पहले को चलाने लगता है। उपभोक्तावादी सामान इंसानों के जीवन की गति को तय करने लगते हैं। 

एकीकृत वैश्विक पूंजीवाद में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता

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चरखे और हथकरघे ने देश के सूती कपड़ा उद्योग तथा उसके उपभोग पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डाला। इसका जो भी प्रभाव पड़ा वह राजनीतिक था। इसने आजादी की लड़ाई के प्रतीक का स्थान ग्रहण कर लिया। इसने जन-जन तक यह संदेश पहुंचाया कि यदि देश के लोगों के आर्थिक हालात खराब हैं तो उसका कारण विदेशी शासन है। हर जगह खादी में नजर आने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता इस भावना को मूर्त रूप में संचारित करते थे। 

यह हमारे यहां नहीं हो सकता!

नेपाल की हालिया घटनाओं के बाद उदारवादी और वाम-उदारवादी एक स्वर से कह रहे हैं कि हमारे यहां ऐसा नहीं हो सकता। इसके लिए भांति-भांति के तर्क दिये जा रहे हैं। 

भारत, चीन, रूस और अमेरिका

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ऐसे में भारत-अमरीकी रिश्तों में वर्तमान तनाव तथा भारत-चीन सुलह-समझौता तात्कालिक और रणकौशलात्मक प्रकृति के ही हो सकते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी भारतीय शासकां की, खासकर मोदी के नेतृत्व में संघियों की कमजोरी और चाटुकारिता का इस्तेमाल कर उन्हें जरूरत से ज्यादा दबाने का प्रयास कर रहे हैं जो भारतीय शासकों को रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों से आंख-मिचौली की ओर धकेल रही है। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादी भी इसकी सीमा जानते हैं। लंपट ट्रम्प भी इस सीमा को पहचानता है। वे भारतीय शासकों के साथ अपनी ‘रणनीतिक साझेदारी’ को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे। 

आर्थिक संकट, विश्व व्यापार संगठन और ‘तटकर युद्ध’

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दोनों विश्व युद्धों के बीच के काल में, खासकर 1929 से शुरू हुई महामंदी के काल में साम्राज्यवादी देशों के बीच ‘मुद्रा युद्ध’ और ‘तटकर युद्ध’ बहुत तेज हो गया था। निर्यात में बढ़त हासिल करने के लिए देश अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन कर रहे थे और तटकर बढ़ा रहे थे। इसने महामंदी को और घनीभूत किया। इस तरह महामंदी से निकलने के देशों के व्यक्तिगत प्रयास ने वैश्विक तौर पर उसे और घनीभूत किया। अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से महामंदी से निजात मिली। 

जेन स्ट्रीट, दलाल स्ट्रीट और जुआरी पूंजीवाद

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पिछले दो-तीन दशकों से भारतीय शासकों ने एक मुहिम के तहत भांति-भांति की सट्टेबाजी को समाज में प्रोत्साहित किया है। इसमें शेयर बाजार (‘‘डेरिवेटिव बाजार’ सहित) की सट्टेबाजी प्रमुख है। संप्रग सरकार और भाजपा सरकार दोनों ने ही इसे खूब प्रोत्साहित किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने लोगों को मजबूर किया है कि लोग इस सट्टेबाजी की ओर जायें। जब बैंकों में जमा पर ब्याज दर महंगाई दर से नीचे हो तो लोग कहीं और पैसा लगाने को मजबूर हो जायेंगे। 

जनतंत्र से जन को बाहर करने की साजिश

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यह याद रखना होगा कि अपने पूंजीवादी जनतंत्र में पूंजीपति वर्ग ने आम जन को बहुत मजबूरी में दाखिल होने दिया था। उसने हर कदम पर प्रतिरोध किया था। केवल आम जन के तीखे संघर्षों के दबाव में ही वह क्रमशः पीछे हटा था। पीछे हट कर भी वह हमेशा असुविधा महसूस करता रहा। जनतंत्र में आम जनों के प्रवेश के बाद उनसे निपटने के लिए कभी फासीवाद की शरण लेता रहा तो कभी जनतंत्र को एकदम खोखला, औपचारिक बनाता रहा। अब फासीवादियों के एक बार फिर उभार के दौर में वह आम जन को भांति-भांति से जनतंत्र से बाहर करने की कोशिश कर रहा है। 

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।