मजदूरों की गुलामी की नयी बेड़ियां

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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4 नई श्रम संहितायें

मोदी सरकार द्वारा 21 नवम्बर, 2025 से घोर मजदूर विरोधी 4 नई श्रम संहिताओं को देशव्यापी स्तर पर लागू किये जाने की घोषणा की जा चुकी है। इन श्रम संहिताओं- वेतन संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का स्थान लिया है। 
    
इन 29 श्रम कानूनों में ज्यादातर और महत्वपूर्ण श्रम कानून जैसे- कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923; ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926; वेतन भुगतान अधिनियम, 1936; औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946; औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947; फैक्टरी अधिनियम, 1948; न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948; कर्मचारी राज्य बीमा निगम अधिनियम, 1948; कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 इत्यादि बीसवीं सदी के दूसरे दशक से पांचवें दशक तक अस्तित्व में आ चुके थे। यह वह समय था जब दुनिया में रूसी क्रांति की गूंज थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वर्ग शक्ति संतुलन मजदूर वर्ग के पक्ष में था और हमारे देश के भीतर भी मजदूर और ट्रेड यूनियन आंदोलन मजबूत स्थिति में था। तब ये श्रम कानून इसी वर्ग शक्ति संतुलन को प्रतिबिम्बित कर रहे थे। 

लेकिन अब 2025 में जब 4 नई श्रम संहिताओं ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का स्थान लिया है तब अंतर्राष्ट्रीय वर्ग शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल चुका है। समाजवादी खेमा कभी का ध्वस्त हो चुका है और विश्व पूंजीवाद उदारीकरण-निजीकरण- वैश्वीकरण की नीतियों के साथ हमलावर है। जबकि मजदूर आंदोलन टूट-फूट, बिखराव का शिकार है। संकटग्रस्त पूंजीवाद पूरी दुनिया में फासीवादी ताकतों को प्रोत्साहित कर रहा है और हमारे देश में तो पिछले एक दशक से अधिक समय से हिंदू फासीवादी ताकतें केंद्र की सत्ता पर काबिज हैं। ऐसे में घोर मजदूर विरोधी 4 नई श्रम संहितायें देश-दुनिया के आज के हालातों में वर्ग शक्ति संतुलन को प्रतिबिम्बित कर रही हैं।

8 घंटे कार्यदिवस के कानूनी अधिकार पर हमला

पुराने श्रम कानूनों में मजदूरों के पास 8 घंटे कार्यदिवस का कानूनी अधिकार था, जो कि नई श्रम संहिताओं में ‘‘कान को सीधे पकड़ने के बजाय घुमाकर पकड़ने’’ की तर्ज पर छीन लिया गया है। वेतन संहिता कहती है कि न्यूनतम वेतन निर्धारित होने के बाद संबंधित सरकार काम के घंटे निर्धारित कर सकती है, जो कि सामान्य कार्यदिवस माना जायेगा। मतलब, यह संहिता संबंधित सरकार को यह शक्ति प्रदान करती है कि वह चाहे तो काम के घंटे 8 से बढाकर 10-12 या 14 कुछ भी कर दे। 

इसी तरह व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता औपचारिक तौर पर 8 घंटे कार्यदिवस की बात करते हुये ओवरटाइम के घंटों पर चुप्पी साध जाती है; और इस तरह मजदूरों का कार्यदिवस बढ़ाने का इंतजाम कर देती है। यह संहिता ओवरटाइम के घंटे तय करने का अधिकार  संबंधित सरकार को सौंप देती है और फिर सरकार इस संहिता द्वारा प्रदान की गई शक्ति का प्रयोग कर एक मजदूर के कार्यदिवस को 12 घंटे तक विस्तारित कर देती है। मतलब, नये कानूनों के तहत यदि पूंजीपति चाहे तो मजदूरों से कानूनी तौर पर 4 घंटा प्रतिदिन ओवरटाइम करवा सकते हैं। जबकि पुराने कानूनों में स्पष्ट दर्ज था कि मजदूरों से हफ्ते में 12 घंटे और तीन महीने की अवधि के दौरान 50 घंटे से अधिक ओवरटाइम नहीं करवाया जा सकता।

हालांकि, उदारीकरण के विगत करीब 4 दशकों में 8 घंटे कार्यदिवस का अधिकार मजदूरों से व्यवहारतः पहले ही छीना जा चुका है। महंगाई के बनिस्पत मजदूरों का वेतन इतना कम है कि वे खुद ही 12 घंटे काम करने को मजबूर हैं। इस तरह व्यवहार में पहले ही 12 घंटे का जो कार्यदिवस मजदूरों पर थोपा जा चुका है, नई श्रम संहितायें उसे कानूनी मान्यता प्रदान कर देती हैं। बाकी, ओवरटाइम का कानूनन डबल भुगतान ज्यादातर जगहों पर न पहले हो रहा था, और न अब होगा।

गौरतलब है कि औद्योगिक पूंजीवाद के शुरुआती दौर में मजदूरों के काम के घंटे नियत नहीं थे और उन्हें सूर्योदय से सूर्यास्त तक अथवा 12-14 और 16 घंटे तक रोज काम करना पड़ता था। पूरी उन्नीसवीं सदी में मजदूरों ने इसके विरुद्ध संघर्ष किया जिसमें शिकागो का मई दिवस आंदोलन सर्वप्रमुख है। लंबे ऐतिहासिक संघर्ष और बलिदानों के बाद ‘‘आठ घंटे काम के, आठ घंटे आराम के और आठ घंटे मनोरंजन के’’ का नारा हकीकत बना और मजदूरों ने पूरी दुनिया में 8 घंटे कार्यदिवस का कानूनी अधिकार हासिल किया।

‘‘हायर एंड फायर’’ (रखो और निकालो)

पुराने कानूनों के तहत कोई भी मजदूर 240 दिन की ड्यूटी के उपरांत स्वतः ही स्थायी रोजगार का अधिकारी हो जाता था। लेकिन नई औद्योगिक संबंध संहिता के तहत अब स्थायी प्रकृति के कामों पर फिक्स्ड टर्म एम्प्लाॅयमेंट (FTE) के तहत अस्थायी मजदूरों की नियुक्ति को कानूनी जामा पहना दिया गया है। इस तरह मजदूरों को जब चाहे रखने और जब चाहे निकालने (हायर एंड फायर) का अधिकार पूंजीपतियों को मिल गया है; जबकि मजदूरों से स्थायी रोजगार पाने का अधिकार छीन लिया गया है। 

हालांकि, उदारीकरण के दौर में 8 घंटे कार्यदिवस की तरह ही स्थायी रोजगार का अधिकार भी मजदूरों से व्यवहार में पहले ही छीना जा चुका है। स्थायी प्रकृति के कामों पर गैर कानूनी तरीके से बड़े पैमाने पर ठेके के तहत मजदूरों की भर्ती और कैजुअल मजदूरों को 6 माह बाद ब्रेक देकर व्यवहार में ‘‘हायर एंड फायर’’ का अधिकार पूंजीपति पहले ही हासिल कर चुके थे। अब इसी गैर कानूनी श्रम अभ्यास (Unfair labour practice) को FTE के रूप में कानूनी मान्यता प्रदान कर दी गई है। इसी तरह इस संहिता में प्रशिक्षुओं (ट्रेनी) को मजदूर की परिभाषा से बाहर करना; और नीम ट्रेनी जैसी श्रेणी भी असल में स्थायी प्रकृति के कामों पर अस्थायी रूप से और बेहद कम वेतन पर मजदूरों को खटाने की ही परियोजना का हिस्सा हैं।

मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों एवं हड़ताल के संवैधानिक अधिकार पर हमला; जबकि पूंजीपति को छंटनी-तालाबंदी की खुली छूट

पूंजीवादी व्यवस्था में एक अकेले मजदूर की पूंजीपति के समक्ष कोई हैसियत नहीं होती है। मजदूर की ताकत तो उसकी सामूहिकता और संगठन शक्ति में निहित होती है, जिसके बल पर वह पूंजीपति का मुकाबला करता है, और सामूहिक सौदेबाजी (collective bargaining) कर अपने लिये राहतें हासिल करता है एवं प्रबंधन द्वारा किये जाने वाले उत्पीड़न का विरोध करता है। औद्योगिक संबंध संहिता मजदूर को उसकी इसी सामूहिकता, संगठन शक्ति और सामूहिक सौदेबाजी की ताकत से वंचित करती है और पूंजीपति के समक्ष उसे अकेला खड़ा कर देती है। इसके अनुसार अब प्रबंधन और मजदूर के बीच कोई औद्योगिक विवाद पैदा होने पर मजदूर के समर्थन में किसी अन्य मजदूर अथवा यूनियन को पक्ष बनने का अधिकार नहीं होगा। इसी तरह इसमें और भी कई हमले मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों पर किये गये हैं। 

हड़ताल मजदूरों का संवैधानिक अधिकार है जिसकी मदद से वे सामूहिक रूप से संघर्ष कर अपने हितों की रक्षा करते हैं। लेकिन, औद्योगिक संबंध संहिता में अब मजदूरों के इसी अधिकार पर हमला करते हुये सभी संस्थानों में हड़ताल पर जाने से 14 दिन पूर्व नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है जबकि पहले यह अनिवार्यता सिर्फ आवश्यक जन उपयोगी सेवाओं (जल, बिजली, टेलीफोन, रेल एवं हवाई सेवा) के लिये ही थी। संहिता में इसके अलावा भी और कई पहरे हड़ताल के अधिकार पर बैठा दिये गये हैं; साथ ही गैर कानूनी घोषित हड़तालों में शामिल मजदूरों और उनका सहयोग-समर्थन करने वाले लोगों पर भारी जुर्मानों से लेकर जेल की सजा तक का प्रावधान कर दिया गया है, जो कि सीधे-सीधे मजदूर आंदोलन के अपराधीकरण की साजिश है। इसमें एक खास बात यह भी है कि गैर कानूनी घोषित हड़तालों के दौरान प्रबंधन द्वारा घोषित लाॅकडाउन वैध माना जायेगा। 

इस नई संहिता के तहत अब 300 तक मजदूरों वाली फैक्टरियों में पूंजीपति स्टैंडिंग आर्डर लागू करने की बाध्यता से भी मुक्त रहेंगे। साथ ही, 300 तक मजदूरों वाली फैक्टरियों में श्रम विभाग की अनुमति के बिना भी एकतरफा छंटनी-तालाबंदी की छूट पूंजीपतियों को होगी। जबकि पहले ये प्रावधान केवल 100 तक मजदूरों वाले संस्थानों तक ही सीमित थे।

फैक्टरी की परिभाषा में बदलाव 

व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता के तहत अब फैक्टरी की परिभाषा को बदल दिया गया है। पुराने कानूनों के तहत जहां पाॅवर (बिजली) से काम होता है वहां 10 अथवा अधिक मजदूर होने पर एवं जहां पाॅवर (बिजली) से काम नहीं होता है वहां 20 मजदूर होने पर उसे फैक्टरी माना जाता था। जबकि नई संहिता में इस संख्या को दो गुना कर दिया गया है; और इस तरह मजदूरों की बड़ी आबादी को संगठित क्षेत्र से बाहर असंगठित क्षेत्र में धकेल दिया गया है। फैक्टी की परिभाषा में यह बदलाव न सिर्फ छोटे पूंजीपतियों अपितु देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों के मुनाफों को भी बढ़ायेगा; क्योंकि आज उत्पादन के विकेंद्रित केंद्रीयकरण के चलते मदर कंपनी से लेकर वेंडर कंपनियों, फिर वर्कशाॅपों से लेकर म

जदूरों की बस्तियों तक उत्पादन का जाल फैला हुआ है। ऐसे में छोटी-छोटी फैक्टरियों एवं वर्कशाॅपों में मजदूरों के भयंकर शोषण से देशी-विदेशी बड़ी कंपनियां भी अकूत मुनाफा कमाती हैं।

महिला मजदूरों से नाईट शिफ्ट

व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता के तहत अब पूंजीपति नाईट शिफ्ट और खतरनाक उद्योगों (रासायनिक, विकिरण प्रभाव वाले और खनन) में भी महिला मजदूरों से काम करा सकेंगे। मोदी सरकार द्वारा पुरुष मजदूरों के साथ महिला मजदूरों की बराबरी और काम के समान अवसर की माला जपते हुये किया गया यह प्रावधान असल में सस्ते श्रम के स्रोत के रूप में महिला मजदूरों की हरसंभव और हर जगह उपलब्धता को सुनिश्चित करने हेतु उठाया गया कदम है। इसका महिला मजदूरों की सुरक्षा, उनके स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर बेहद बुरा असर पड़ेगा।

औद्योगिक दुर्घटनाओं को आमंत्रण

उदारीकरण के दौर में अन्य सभी श्रम कानूनों की तरह सुरक्षा संबंधी श्रम कानून भी महज कागजों की ही शोभा बढ़ा रहे हैं; परिणामस्वरूप आगजनी से लेकर अन्य औद्योगिक दुर्घटनायें लगातार बढ़ रही हैं। व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता इन्हें रोकने हेतु सुरक्षा मापदंडों को कसने के बजाय और अधिक ढीला करती है; और इस तरह पहले से बढ़कर औद्योगिक दुर्घटनाओं को आमंत्रित करती है। पुराने कानूनों के तहत 100 या अधिक मजदूरों वाले सभी फैक्टरी संस्थानों में सेफ्टी कमेटियों का होना जरूरी था। लेकिन, नई संहिता के तहत अब सेफ्टी कमेटियां सिर्फ उन्हीं फैक्टरी-संस्थानों में होंगी जहां 500 या अधिक मजदूर काम करते हों। इसी तरह अब खतरनाक उद्योगों मे भी 250 या अधिक मजदूर होने पर ही सेफ्टी कमेटियां होंगी। मतलब, पूंजीपतियों के मुनाफे की हवस भविष्य में कहीं अधिक मजदूरों की जान लेगी और उन्हें अपाहिज बनायेगी।

सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर हमला

सामाजिक सुरक्षा संहिता मजदूरों को पहले से हासिल कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) एवं कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) की सुरक्षा योजनाओं पर हमले करती है। इस संहिता के तहत अब ESIC में मालिक के योगदान को 4.75 प्रतिशत से घटाकर 3.25 प्रतिशत एवं मजदूर के योगदान को 1.75 प्रतिशत से घटाकर 0.75 प्रतिशत कर दिया गया है। इसी तरह म्च्थ् में मालिक और मजदूर के योगदान को 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे दूरगामी तौर पर ये योजनायें कमजोर होंगी जिसका सीधा नुकसान मजदूरों को होगा। क्योंकि ज्यादातर मजदूरों के पास एक मात्र बचत म्च्थ् के रूप में ही होती है; और निजीकरण के दौर में कोई दुर्घटना अथवा गंभीर बीमारी की अवस्था में म्ैप्ब् ही उनका एकमात्र सहारा होता है। इसके अलावा इस संहिता में यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि यदि किसी संस्थान के मजदूरों का बहुमत म्ैप्ब् और म्च्थ् से बाहर आना चाहता है तो संस्थान को इसकी इजाजत होगी। अब बहुमत कैसे हासिल करना है, यह मालिक-प्रबंधन बखूबी जानते हैं! ऐसे में जो कंपनी मालिक इन योजनाओं से बाहर आना चाहेगा आसानी से आ जायेगा। लेकिन, तब मजदूर कहां जायेंगे?

स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा पर हमला

नई श्रम संहिताओं में स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा पर भी हमले बोले गये हैं। औद्योगिक संबंध संहिता के तहत अब श्रम न्यायालय नहीं होंगे। बस, नेशनल ट्रिब्यूनल एवं क्षेत्र विशेष के लिये औद्योगिक ट्रिब्यूनल होंगे; और उनमें जजों के साथ  नौकरशाह भी बैठेंगे। इसी तरह व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता के तहत किसी विवाद की सुनवाई का अधिकार हाईकोर्ट से नीचे के न्यायालयों को नहीं होगा। उनकी जगह एक प्रशासनिक प्राधिकरण विवादों की सुनवाई करेगा। मतलब, यहां तो न्याय पाने के लिये मजदूरों को सीधे-सीधे प्रशासन के हवाले कर दिया गया है।

उपरोक्त की भांति और भी बहुत से मजदूर विरोधी बदलाव इन श्रम संहिताओं में कर दिये गये हैं, जिनमें पूंजीपतियों को ‘‘सेल्फ सर्टिफिकेशन’’ का अधिकार बेहद दिलचस्प है। मतलब अब पूंजीपतियों की यह घोषणा कि ‘‘उनके संस्थान में श्रम कानूनों की परिपालना होती है’’ को कानूनी मान्यता हासिल होगी। 
    

‘‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’’ के नाम पर और देशी-विदेशी पूंजीपतियों की मांग पर लाई गई ये श्रम संहितायें असल में बीसवीं सदी में हासिल बहुत से कानूनी अधिकारों को मजदूरों से छीन लेती हैं और उन्हें गुलामी की नई बेड़ियों में जकड़ती हैं। ऐसे में मजदूरों को एक वर्ग के रूप में संगठित होकर पूंजीपति वर्ग और फासीवादी मोदी सरकार के इस हमले का प्रतिरोध करना होगा। उन्हें पूंजीवाद के विरुद्ध मजदूर राज-समाजवाद का नारा बुलंद करना होगा।
 

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