विविध

डरा हुआ शासक वर्ग और उसका तंत्र, लेकिन मजदूर को बिन लड़े उसका अधिकार नहीं देगा

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मैं पिछले 3 दिन में 2 बार गिरफ्तार हुआ। 13 मार्च को हम बवाना औद्योगिक क्षेत्र के बंगाली चौक पर मजदूरों से गैस की समस्या को लेकर बात कर रहे थे और उनको गैस की समस्या के लिए आंदोलन के लिए सूचित कर रहे

अब शहीदों की प्रतिमाओं से भी इन्हें डर लगने लगा है

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23 मार्च 2026 को जबकि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू के शहादत दिवस पर लोग उन्हें याद कर रहे थे, उसी रात तड़के 3 बजे भाजपा सरकार द्वारा शाहजहांपुर में नगर निगम के पास 1972 में

युद्ध नहीं शांति

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यदि आप दूर अपने ड्राइंग रूम में बैठकर
युद्ध का मजा ले रहे हैं
आसमान से बस्तियों, स्कूलों और अस्पतालों पर
गिरती मिसाइलों का 
आतिशबाजी की तरह आनंद ले रहे हैं

एल जी बी टी क्यू समुदाय के अधिकारों पर कानूनी हमला

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अभी मार्च 2026 में भारत की संसद ने एक नया बिल पास किया- ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक। यह विधेयक ट्रांसजेंडर और एल जी बी क्यू समुदाय के कानूनी अधिकारों पर हमला है। विपक्ष और

बनभूलपुरा को उजाड़ने से बचाने की मांग

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हल्द्वानी/ विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक संगठनों ने सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय के माध्यम से उत्तराखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री को बनभूलपुरा की जनता के आवास की रक्ष

युद्ध के बीच इजरायल गये भारतीय मजदूरों के हालात

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ईरान पर हमले की शुरुआत करते हुए इजराइल-अमेरिका ने ईरान के स्कूलों पर मिसाइलें गिराईं जिसमें ईरान की 5 से 12 साल की 160 से अधिक निर्दोष मासूम बच्चियां मार दी गईं। अमरीकी-इ

युद्ध विरोधी नारों के साथ मनाया गया शहादत दिवस

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इस बार भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू का शहादत दिवस युद्ध की गूंज के बीच साम्राज्यवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया। 22 व 23 मार्च को विचार गोष्ठी, युद्ध विरोधी सभा, साम्र

पेरिस कम्यून दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

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18 मार्च, 1871 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में मजदूरों ने अपना पहला राज कायम किया था, जो कि मानव इतिहास के गौरवशाली पन्नों में ‘‘पेरिस कम्यून’’ के नाम से दर्ज है। फ्रांस औ

साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में बदलता शक्ति संतुलन

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अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों ने खाड़ी के देशों के शासकों को ईरान के विरुद्ध युद्ध में प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी कराने की पूरी कोशिश की। वे इस बात के लिए उनको उकसाते रहे कि ईरान ने उनके देश पर हमला किया है, इसलिए उन्हें इस हमले का विरोध करना चाहिए।

इजरायल-अमेरिका और धर्मयुद्ध

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पूंजीवादी सोच की यह समस्या है कि वह अपने विश्लेषण में स्वयं पूंजीपति व्यवस्था के मूलभूत चरित्र को कभी संज्ञान में नहीं लेती। वह कभी स्वीकार नहीं करती कि यह अन्याय-अत्याचार और शोषण वाली वर्गीय व्यवस्था है जो पूंजीपति वर्ग के हित में उसके हिसाब से चलती है। कि छिपी या खुली हिंसा इसका अनिवार्य तत्व है।

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।