विविध

साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में बदलता शक्ति संतुलन

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अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों ने खाड़ी के देशों के शासकों को ईरान के विरुद्ध युद्ध में प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी कराने की पूरी कोशिश की। वे इस बात के लिए उनको उकसाते रहे कि ईरान ने उनके देश पर हमला किया है, इसलिए उन्हें इस हमले का विरोध करना चाहिए।

एल जी बी टी क्यू समुदाय के अधिकारों पर कानूनी हमला

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अभी मार्च 2026 में भारत की संसद ने एक नया बिल पास किया- ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक। यह विधेयक ट्रांसजेंडर और एल जी बी क्यू समुदाय के कानूनी अधिकारों पर हमला है। विपक्ष और

इजरायल-अमेरिका और धर्मयुद्ध

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पूंजीवादी सोच की यह समस्या है कि वह अपने विश्लेषण में स्वयं पूंजीपति व्यवस्था के मूलभूत चरित्र को कभी संज्ञान में नहीं लेती। वह कभी स्वीकार नहीं करती कि यह अन्याय-अत्याचार और शोषण वाली वर्गीय व्यवस्था है जो पूंजीपति वर्ग के हित में उसके हिसाब से चलती है। कि छिपी या खुली हिंसा इसका अनिवार्य तत्व है।

युद्ध के बीच इजरायल गये भारतीय मजदूरों के हालात

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ईरान पर हमले की शुरुआत करते हुए इजराइल-अमेरिका ने ईरान के स्कूलों पर मिसाइलें गिराईं जिसमें ईरान की 5 से 12 साल की 160 से अधिक निर्दोष मासूम बच्चियां मार दी गईं। अमरीकी-इ

न्यूनतम वेतनमान को लेकर हरियाणा सरकार की नौटंकी

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11 साल से अधिक समय से हरियाणा राज्य में न्यूनतम वेतनमान पुनर्निधारित (रिवाइज) नहीं हुआ है। हर 5 साल में न्यूनतम वेतनमान रिवाइज करने का नियम है। महंगाई के सापेक्ष जरूरत की

युद्ध विरोधी नारों के साथ मनाया गया अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस

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इस बार 8 मार्च : अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के अवसर पर दिल्ली से लेकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड तक आयोजित कार्यक्रमों में युद्ध की गूंज रही। सभा-गोष्ठियों

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से दुखी और हैरान बनभूलपुरा

हल्द्वानी/ 24 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जयमाला बाघची की पीठ ने बनभूलपुरा प्रकरण में अंतरिम आदेश दिया। इस अंतरिम आद

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।