मानेसर मजदूर आंदोलन के दौरान जेल का अनुभव
मानेसर (गुड़गांव) मजदूर आंदोलन का दमन करने के लिए पुलिस प्रशासन ने पहले मजदूरों को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर जेल भेजा। फिर 12 अप्रैल की रात को हमें (इंकलाबी मजदूर केन्
मानेसर (गुड़गांव) मजदूर आंदोलन का दमन करने के लिए पुलिस प्रशासन ने पहले मजदूरों को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर जेल भेजा। फिर 12 अप्रैल की रात को हमें (इंकलाबी मजदूर केन्
जांच में पता चला है कि तमिलनाडु के कपड़ा श्रमिकों को काम के दौरान मासिक धर्म के दर्द को सहन करने के लिए बिना लेबल वाली गोलियां दी गई थीं, जिसके चलते राज्य ने कारखानों का न
इसी शहर के तीन मुहल्ले
आपस में बातें करते हैं
अपने सुख-दुख अपनी खुशियां
मिलकर बांटा करते हैं
आज यह स्थापित बात है कि भारत के हिन्दू फासीवादियों ने आजादी की लड़ाई में क्रूर, धूर्त व अत्याचारी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का खुले व छिपे ढंग से समर्थन किया था। ये आजादी की लड़ाई से दूर-दूर रहे। और उन सामंती, राजाओं की गोद में बैठकर ऊंघते-सोते रहे जो अंग्रेजों के पिट्ठू, दलाल व लठैत थे। हेडगेवार, गोलवलकर आदि को अपने घृणित हिन्दू साम्प्रदायिक एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए पैसा व अन्य संसाधन राजा-महाराजाओं, जमींदारों, सूदखोरों व अंग्रेजों के चाकर व्यापारियों से ही आता था।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
(क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, चेतना आंदोलन, उत्तराखंड महिला मंच, इंसानियत मंच, सी पी आई, सी पी एम, सी पी आई एम एल-लिबरेशन, मजदूर संघर्ष संगठन, तंजीम ए रहनुमा ए मिल्ल
22 जून 2026 को पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत की एक आतंकवाद विरोधी अदालत ने बलूच कार्यकर्ता डा.
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।