‘‘आम चुनाव का परिणाम अनिश्चित’’

9 मई को भारत के शेयर बाजार में हाहाकार मच गया। बाम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक जिसे सेंसेक्स के नाम से जाना जाता है एक हजार अंक से ज्यादा गिर गया और यही हाल निफ्टी का भी हुआ वह 22,000 के कथित मनोवैज्ञानिक सीमा से नीचे आ गया। बताया जा रहा है कि निवेशकों के 7.3 लाख करोड़ रुपये डूब गये। इसी तरह रुपया भी डालर के मुकाबले और कमजोर हो गया। 
    
शेयर बाजार के डूबने का एक कारण जहां यह बताया गया कि कम्पनियों के चौथी तिमाही के वित्तीय परिणाम आशानुरूप नहीं हैं और दूसरा कारण ज्यादा दिलचस्प और महत्वपूर्ण है कि आम चुनाव का परिणाम अनिश्चित हो गया है। 
    
कहां तो मोदी एण्ड कम्पनी ‘अबकी बार चार सौ पार’ का नारा उछाल रही थी और अब कहां शेयर बाजार के धुरंधरों और धूर्त विदेशी निवेशकों को लगने लगा है कि यह भी संभव है कि मोदी सत्ता में वापस न आ पाये। उनका ‘‘डार्लिंग’’ चुनाव हार जाये। 
    
ये परजीवी वित्तीय राक्षस अगर यूं घबरा रहे हैं तो अवश्य ही इसमें कुछ न कुछ बात होगी। धूर्त विदेशी निवेशक भारत से भाग रहे हैं तो यूं ही नहीं भाग रहे होंगे। इन धूर्त लालचियों को कुछ न कुछ अंदरखाने की खबर होगी। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।