फैक्टरी में अपंग बनते मजदूर

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कानपुर देहात के मोगनी पूरबराया के इंदिरा नगर कालोनी निवासी शीबू कुमार फरीदपुर बरेली में केसरपुर के पास स्थित एल्युमिनियम फैक्टरी में काम करते थे। शीबू कुमार ने बताया कि वह एल्यूमिनियम की मशीन पर काम करते थे। काम करते समय मशीन में कोई फाल्ट आ गया। इसकी वजह से शीबू कुमार के दोनों हाथों के अंगूठे कट गये। इस वजह से शीबू कुमार खून में लथपथ जमीन पर गिर गया। साथी श्रमिकों ने उन्हें उठाकर अस्पताल भेजा व शीबू कुमार के परिवार को सूचना दी। परिवार वाले आये और उन्होंने फैक्टरी मालिक को शीबू कुमार का इलाज कराने को कहा तो मालिक ने इनकार कर दिया। 
    
तब शीबू कुमार की ओर से थाने में तहरीर दे दी गयी। इंस्पेक्टर राधेश्याम ने बताया कि फैक्टरी मालिक को बुलाया गया है। अगर उसने इलाज नहीं कराया तो उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की जायेगी। 
    
यहां सोचने की बात है कि अगर रिपोर्ट लिखा दी जाये और मालिक मजदूर का इलाज भी करा दे। और शीबू कुमार ठीक हो जाये। क्या मालिक उसके अंगूठे वापस दिला सकता है। 
    
साथियों नहीं, संगठनबद्ध हुए बिना हमारी समस्यायें हल नहीं होंगी। इसलिए मजदूर जहां कहीं भी हों संगठनबद्ध होना चाहिए। तब ही हम ठेका प्रथा, ईएफटी और मजदूर विरोधी कानूनों का विरोध कर पायेंगे अन्यथा हम निराश होकर अपने भाग्य नसीब को कोसते रहेंगे। यह लड़ाई मजदूर वर्ग की है और मजदूर वर्ग ही संगठित हो लड़ेंगे। जैसा अभी नेपाल में हुआ। 14-28 वर्ष के युवाओं ने सोशल मीडिय बैन किये जाने व भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतर कर जो किया है। भारत के संगठित व असंगठित मजदूरों को भी संघर्ष करना पड़ेगा। तभी हम अपने कानूनों व अधिकारों व शोषण उत्पीड़न के खिलाफ कुछ कर पायेंगे। अन्यथा हमारे जाने कितने मजदूर शीबू कुमार की तरह अपने हाथ-अंगूठा गंवाते रहेंगे। -एक पाठक, बरेली

आलेख

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।