फिलिस्तीन -प्रभात मिलिन्द

बादलों और परिंदों की खातिर अब कोई जगह नहीं है
अब काले चिरायंध धुंए से भरे आसमान में
बारूद की चिरंतन गंध ने अगवा कर लिया है
फूलों की खुशबू...वनस्पतियों का हरापन

बच्चों का बचपन, युवाओं के प्रेमपत्र,
औरतों की अस्मत और बुजुर्गों की शामें
सब की सब गिरवी हैं आज जंग
और दहशतगर्दों के जालिम हाथों...

जंग और फसाद में जिंदा बच कर भी
जो मारे जाते हैं वे बच्चे और औरतें हैं
मासूम बच्चे..मजलूम बच्चे...अपाहिज बच्चे..यतीम बच्चे..
बेवा औरतें...बे औलाद औरतें..रेजा रेजा औरतें...
हवस की शिकार औरतें 

बच्चे उस वक्त मारे गए जब वे
खेल रहे थे अपने मेमनों के साथ
औरतें इबादतगाहों में मारी गईं..या फिर बावर्चीखानों में
बुजुर्ग मसरूफ थे जब अमन के मसौदे पर बहस में तब मारे गए
और, जवान होते लड़कों को तो
मारा गया बेसबब...सिर्फ शक की बिना पर

नरमुंडों की तिजारत करने वाले हुक्मरानों!
इस पृथ्वी पर कुछ भी नश्वर नहीं...
न तुम्हारी हुकूमत और न ही तुम्हारी तिजारत
कुछ बचे रहेंगे तो इतिहास के कुछ जर्द पन्ने
और उन पन्नों में दर्ज तुम्हारी फतह के टुच्चे किस्से

सोचो जरा, जब कौमें ही नहीं बचेंगी
तब क्या करोगे तुम तेल के इन कुंओं का
और किसके खिलाफ काम आएगी असले और बारूद की 
तुम्हारी ये बड़ी-बड़ी दुकानें!

एक सियासी नक्शे से एक मुल्क को
बेशक खारिज किया जा सकता है
लेकिन हक की लड़ाई ओर आजादी के
सपनों को किसी कीमत पर हरगिज नहीं

इसी रेत और मिट्टी में एक रोज फिर से बसेंगे
तंबुओं के जगमग और धड़कते हुए डेरे
बच्चे फिर से खेलेंगे अपनी नींदों में परियों के साथ
और भागते फिरेंगे अपने मेमनों के पीछे 
औरतें पकायेंगी खुशबूदार मुर्ग-रिजाला
और खुबानी-मकलुबा मेहमानों की खिदमत में
सर्दियां की रात काम से थके लौटे मर्द
अलाव जलाए बैठ कर गाएंगे अपनी पसंद के गाने
बुजुक और रवाब की धुनों पर

एक दिन लौट आयेंगे कबूतरों के परदेशी झुंड 
बचे हुए गुंबद और मीनारों पर फिर अपने-अपने बसेरों में

देखिए तो सिर्फ एक अंधी सुरंग का नाम है यह
सोचिए तो उम्मीद और मुखालफत की एक लौ है फिलिस्तीन!

आलेख

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।