फासीवाद / साम्प्रदायिकता,

महिला हितैषी या पाखण्डी

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पिछले दिनों भारत की संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष में महिला हितैषी होने की प्रतियोगिता चली। मौका था महिला आरक्षण बिल व परिसीमन पर चर्चा का। एक चतुर चुनावबाज पर महिलाओं को

मजदूरों की न्यायपूर्ण आवाज दमन से नहीं दबेगी

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वेतन बढ़ोत्तरी की मांग को लेकर पैदा हुआ भारत के मजदूरों का उभार लगातार जारी है। हरियाणा, उ.प्र., राजस्थान, उत्तराखण्ड, पंजाब आदि राज्यों में फैलते हुए यह लगभग समूचे उत्तर

गाजा नरसंहार में भारत सरकार की भूमिका

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बीते दिनों संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत फ्रांसेस्का अल्बानीज ने गाजा नरसंहार में भारत की भूमिका बताने वाली रिपोर्ट पेश

भारतीय दूल्हा और सर्वोच्च न्यायालय

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हमारा देश एक अनोखा देश है। इसकी हर चीज अनोखी है। यहां तक कि हमारे देश का अनोखापन हर जगह विराजमान है। हमारे देश के प्रधानमंत्री अनोखे हैं। हमारी संसद अनोखी है। और हमारे दे

जो उन्हें पसंद, बस वही बात कहो

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मोदी की महामानव की छवि बनाने में करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं। उन्हें विश्वगुरू, नान बायलॉजिकल, दुनिया में डंका बजाने वाले आदि न जाने किन-किन उपमाओं से सुशोभित करवाया

‘हिन्दू सम्मेलन’ : हिन्दू फासीवादी अभियान के हिस्से

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में पूरे देश में जगह-जगह ‘हिन्दू सम्मेलन’ आयोजित कर रहा है। ये ‘हिन्दू सम्मेलन’ 15 जनवरी 2026 से शुरू हुए हैं। पूरे देश में ऐसे

वंदे मातरम की अनिवार्यता

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हाल ही में वंदे मातरम के गायन को लेकर मोदी सरकार ने नये दिशा-निर्देश जारी कर दिये हैं। इसके तहत वंदे मातरम को कई आधिकारिक कार्यक्रमों में गाया जाना अनिवार्य बना दिया गया

रौशन है अमन-भाईचारे की लौ

हिन्दू फासीवादियों द्वारा देश में लगातार नफरत का माहौल बनाया जा रहा है। इस नफरती माहौल के कारण जब तब वहशी, वीभत्स घटनाएं सामने आ रही हैं। कहीं यूं ही बुजुर्ग मुसलमान को न

फिर एक बार महात्मा बुद्ध और फासीवादी हिटलर

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खबर है कि बिहार सरकार ने धार्मिक स्थलों और शिक्षण संस्थानों के पास मांस-मछली के बेचने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। बिहार के भाजपाई उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।