जिन्दगी और मौत
जिन्दगी और मौत के बीच फासला बहुत कम रह जाता है। यह तब महसूस हुआ जब किसी को केवल मुसलमान होने पर मारा जा सकता है। 31 जुलाई को नूंह में हुई साम्प्रदायिक हिंसा को आधार बनाकर
जिन्दगी और मौत के बीच फासला बहुत कम रह जाता है। यह तब महसूस हुआ जब किसी को केवल मुसलमान होने पर मारा जा सकता है। 31 जुलाई को नूंह में हुई साम्प्रदायिक हिंसा को आधार बनाकर
राजस्थान, जिला अलवर के गांव टिकरी गोविंदगढ़ का निवासी सैकुल खान अलवर में रहकर पढ़ाई कर रहा था। वह पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहा था। उसकी अभी लगभग 2 महीने पहले ही शादी हुई थी
हरियाणा के नूंह और गुड़गांव में साम्प्रदायिक दंगों के बाद हरियाणा के गृहमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार इनके ‘मास्टरमाइंड’ की तलाश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि वह यह भी छा
मणिपुर की स्थिति बेहद संकटपूर्ण है। लगभग 70 हजार से ज्यादा लोगों को शरणार्थियों की तरह रहने को बाध्य कर दिया गया है। 5000 से
मार्क ट्वेन के हवाले से एक कहावत है- ‘झूठ, महाझूठ और आंकड़े’। इसका आशय यह है कि आंकड़ों के जरिये कुछ भी साबित किया जा सकता है। इसीलिए आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
हमारे देश में बढ़ता हुआ हिन्दू फासीवादी आंदोलन सबके जीवन को प्रभावित कर रहा है। आने वाले वक्त में यह रोजमर्रा के जीवन को किन-किन मामलों में और प्रभावित कर सकता है इसे हम ज
3 मई को शुरू हुई मैतेई और कुकी समुदायों के मध्य हिंसा पर केंद्र और राज्य की भाजपा नीत सरकारों का रुख एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि ये सरकारें अपने हिन्दू राष्ट्रवाद क
‘बांटो और राज करो’ की अपनी नीति के तहत हिन्दू फासीवादी आजकल उन मुसलमानों में भी फूट डालने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं जिन पर वैसे वे एक समुदाय के तौर पर लगातार हमला करते
‘इकोचैम्बर’ या प्रतिध्वनि कक्ष अथवा अनुनाद कोठरी ऐसी बंद जगह को कहते हैं जिसमें वही आवाज बार-बार लौट आती है। वही आवाज बार-बार सुनाई पड़ती है।
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।