सूरमा ढेर हो गये और विदूषक नायक बन गये

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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भारत की राजनीति एक नये दौर से गुजर रही है। कल तक जो आक्रामक मुद्रा में थे वे आज बचाव की मुद्रा में हैं। और कल तक जिनको घेरा जाता था आज वे ‘वीर योद्धा’ बन गये हैं, घेरने वाले बन गये हैं। सत्ता पक्ष सवालों के घेरे में है और विपक्ष ने उसकी नाक में दम किया हुआ है। भूमिकाएं बदल गयी हैं; स्वर बदल गये हैं। 
    
यह सब कैसे हुआ? 
    
ऐसा क्या हुआ कि जो संघ-भाजपा भारतीय राजनीति की कार्यसूची (एजेण्डा) तय करते थे उन्हें आज विपक्ष खासकर कांग्रेस और उसमें भी राहुल गांधी ने मोदी एण्ड कम्पनी ने हैरान-परेशान किया हुआ है। उनकी धुन पर सत्ता पक्ष नाच रहा है। 
    
अक्टूबर के पहले पखवाड़े में देश की राजधानी राजनैतिक जंग का मैदान बनी रही। घात-प्रतिघात, दमन-प्रतिरोध, धमकाना-चैंकाना आदि का खेल खूब खेला गया। मोदी ने भले ही कोई प्रेस  कांफ्रेंस न की हो पर कुछ ऐसा हुआ कि मोदी के पार्टी प्रवक्ताओं को एक-एक दिन में चार-चार बार प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ी। जो गोदी मीडिया राहुल और विपक्ष को चंद मिनट के कवरेज देने को नहीं तैयार था अब वह घण्टों-घण्टों राहुल को कवरेज दे रहा था। मोदी एण्ड कम्पनी के सारे हथकंडे नाकारा साबित हुए और राहुल का हर दांव-पेंच सुर्खियां बटोर रहा था। 
    
हालात यहां तक पहुंचे कि मोदी से ज्यादा चर्चा के विषय काकरोच जनता पार्टी के नेता दीपके, रांका, दास और आइसा की नेहा बोरा बने हुए थे। कहां मोदी पहले अपने जन्मदिन और फिर अपनी सत्ता के 25 साल का महाउत्सव मनाना चाहते थे और कहां ऐसा हुआ कि मोदी महामानव के बजाय मजाक, हास्य, मीम्स के ऐसे पात्र बन गये जिनसे हर छोटा-बड़ा मजे ले रहा था। उनकी सारी कवायद के बाद भी न तो उनका जन्मदिन और न 25 साल कोई खास चर्चा का विषय बन सके। एक मजमेबाज के लिए इससे बुरा क्या हो सकता है।
    
मोदी एण्ड कम्पनी ने दिल्ली में भारतीय सेना को छोड़कर अपनी पूरी फौज उतार दी। हजारों की संख्या में उन स्थानों से भी अर्द्धसैनिक बल बुलाये गये जहां हालात मोदी सरकार के काबू से या तो बाहर हैं या बस किसी तरह काबू में बने हुए हैं। मणिपुर में हाल में बढ़ गयी हिंसा के पीछे एक कारण यह भी माना गया कि वहां से अर्द्धसैनिक बलों को दिल्ली में तैनात कर दिया गया था। दिल्ली में सुरक्ष बलों की तैनाती अभूतपूर्व थी। और मजे की बात है प्रदर्शनकारियों ने बता दिया कि वे पुलिस के डण्डों, हिरासत-जेल जाने से नहीं डरते हैं। आतंकित करने वाले इन बहादुर प्रदर्शनकारियों के सामने खुद को ‘असुरक्षित’ महसूस कर रहे थे। 
    
मोदी के केन्द्र की सत्ता में 12 साल हो गये हैं और तेरहवां साल ऐसा चल रहा है मानो जनता ने ठान लिया हुआ है कि इनकी सत्ता की ‘तेरहवीं’ ही करनी है। 
    
चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, एस आई आर की प्रक्रिया आदि तो क्रमशः पृष्ठभूमि में चले गये और स्वयं मोदी सरकार विपक्ष के साथ देश के निशाने पर आती गयी। 
    
हर कोई मोदी सरकार के गिरावट की, बुरे काल की तुलना 2012 की मनमोहन सरकार के दिनों से करने लगा। जिस तरह भाजपा-संघ यानी हिन्दू फासीवादी मनमोहन सरकार के विरुद्ध पैदा हुए भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन की पीठ पर सवार होकर सत्ता पर पहुंचे थे, अब वही काम कांग्रेस पार्टी व विपक्ष करने लगा। छात्र-युवा व काकरोच जनता पार्टी के द्वारा पैदा की गयी लहर पर सवार होकर वे सत्ता पर पहुंचने के मंसूबे बांधने लगे। मोदी की हालत दिनों दिन 2012-14 के मनमोहन की तरह होती जा रही है। सवालों के घेरे में हर ओर से फंसे हुए, हर तरह से उलझन में, हर दांव का उल्टा पड़ते जाना। 
    
हिन्दू फासीवादियों के इस तरह से घिरे होने से वे सब सुकून महसूस कर रहे हैं जिनका जीवन इन धूर्तों ने मुसीबत में डाला हुआ था। 
    
यह सब इसलिए संभव हुआ कि इस वर्ष पहले मजदूरों ने मोदी एण्ड कम्पनी को एक बड़ी चुनौती दी और फिर छात्र-युवाओं ने पूरे गर्मी व बरसात भर मोदी एण्ड कम्पनी को हैरान-परेशान किया हुआ था। विपक्ष खासकर कांग्रेस और उसमें भी राहुल तो सिर्फ मौके का फायदा उठा रहे हैं। अन्यथा वे भी उतने क्षुद्र, बौने हैं जितने मोदी एण्ड कम्पनी हैं।     
    
सूरमा और विदूषक जल्दी ही अपनी कब्र में होंगे और असली बहादुर, असली नायक मजदूर-मेहनतकश, छात्र-युवा, आम औरतें साबित होंगी। इतिहास बार-बार दिखलाता है कि कोई भी अपनी कब्र तक स्वयं नहीं पहुंचता है। 

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