फासीवाद

हिन्दू फासीवाद, बिहार चुनाव और एन आर सी

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चुनाव आयोग और संघी सरकार के मंत्रियों का दावा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पहली बार नहीं हो रही, पहले भी कई बार हो चुकी है यह सामान्य प्रक्रिया है, इस पर हंगामा क्यों! वास्तव में ये, यहां भी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं। वास्तव में यह पहले के मतदाताओं का पुनरीक्षण भी है। विपक्ष का जहां तक सवाल है यह बुनियादी सवाल खड़ा करने के बजाय व्यवहारिकता पर ज्यादा प्रश्न खड़े कर रहा है। परीक्षण के लिए बेहद कम समय होना एक समस्या है मगर बुनियादी प्रश्न नहीं।

जनतंत्र से जन को बाहर करने की साजिश

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यह याद रखना होगा कि अपने पूंजीवादी जनतंत्र में पूंजीपति वर्ग ने आम जन को बहुत मजबूरी में दाखिल होने दिया था। उसने हर कदम पर प्रतिरोध किया था। केवल आम जन के तीखे संघर्षों के दबाव में ही वह क्रमशः पीछे हटा था। पीछे हट कर भी वह हमेशा असुविधा महसूस करता रहा। जनतंत्र में आम जनों के प्रवेश के बाद उनसे निपटने के लिए कभी फासीवाद की शरण लेता रहा तो कभी जनतंत्र को एकदम खोखला, औपचारिक बनाता रहा। अब फासीवादियों के एक बार फिर उभार के दौर में वह आम जन को भांति-भांति से जनतंत्र से बाहर करने की कोशिश कर रहा है। 

75 वर्ष : भागवत-मोदी दोनों की गले की हड्डी

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बीते दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 75 वर्ष पूरे होने पर रिटायर होने व नये लोगों को आगे आने का मौका देने की बात कर मोदी को याद दिला दिया कि वे बहुत जल्द 17 सितम्बर 25 को

कांवड़ यात्रा और धर्म के ठेकेदार

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कांवड़ यात्रा शुरू होते ही हिन्दू धर्म के संघी लम्पट ठेकेदारों को भी रोजगार मिल जाता है। रोजगार समाज में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने का, गुंडागर्दी करने का, मारपीट करने

सबसे बड़ा कालनेमि कौन

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पिछले दिनों से उत्तराखण्ड सरकार ने ‘आपरेशन कालनेमि’ चलाया हुआ है। इस पुलिसिया आपरेशन के तहत पुलिस वाले साधु वेष या भगवा वस्त्र पहने हुए लोगों की जांच पड़ताल कर रहे हैं। घो

मणिपुर के बाद महाराष्ट्र में आग लगाते शासक

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पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूलों में कक्षा एक से पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी लागू करने का फैसला लिया। अभी तक राज्य में मराठी और अंग्रेजी ही पहली कक्षा से पढ़ाई ज

अमेरिका में ट्रंप की तानाशाही के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन

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14 जून, 2025 को लाखों लोगों ने अमेरिका में 2,000 से अधिक स्थानों और 50 राज्यों में से प्रत्येक में ट्रम्प प्रशासन की दक्षिणपंथी नीतियों और तानाशाही तरीकों के खिलाफ विरोध

‘‘लोकतंत्र के रक्षक’’ हिंदू फासीवादी

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26 जून आते ही संघी सरकार और मोदी-शाह की जोड़ी को इन्दिरा गांधी की बार-बार याद आ जाती है। हर जोड़-तोड़ और लफ्फाजी में माहिर संघी अपने विरोध को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कलाबा

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।