फासीवाद

चुनाव आयोग की ‘एन आर सी’ का विरोध जरूरी

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25 जून से भारत के चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची में गहन पुनरीक्षण की शुरूआत की घोषणा की है। बिहार में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके साथ ही यह खबर भी

जब राष्ट्रवाद बस अंधराष्ट्रवाद बन कर रह जाये!

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राष्ट्रवाद एक ऐतिहासिक परिघटना है जिसका पहले प्रगतिशील पहलू प्रधान था, अब प्रतिक्रियावादी पहलू प्रधान है। समाज की गति में इसकी जड़ें थीं- पूंजीवाद की उत्पत्ति और विकास में। प्रगतिशील राष्ट्रवाद ने समाज को आगे ले जाने का काम किया। अब प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद समाज को आगे जाने में बाधा बन रहा है। और पूंजीपति वर्ग अंधराष्ट्रवाद के रूप में इसका इस्तेमाल कर रहा है।

निकम्मी मोदी सरकार को आइना दिखाता मणिपुर

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मई, 2023 में मणिपुर में जो आग भाजपा-संघ के लोगों ने अनूसूचित जनजाति आरक्षण में जबरदस्ती मैतई समुदाय को शामिल कर के लगायी थी, वह आग आज तक नहीं बुझ पायी। मोदी सरकार के सारे

चाल, चरित्र और चेहरा

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पिछले दिनों सोशल मीडिया पर भाजपा के कई नेताओं के अश्लील वीडियो वायरल हुए। इन वीडियो के वायरल होने के बाद भाजपा के अपनी पार्टी के बारे में उछाले जाने वाले नारे ‘‘चाल, चरित

आपरेशन कगार बंद करो! ये कत्लेआम बंद करो!!

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देश में माओवाद के सफाये पर उतारू फासीवादी सरकार ने बीते कुछ दिनों में भारी पुलिस व सैन्य बल लगाकर ढेरों माओवादी कार्यकर्ताओं व आदिवासियों की हत्यायें कर दीं। मारे जाने वा

संस्कृति के ठेकेदार

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कुछ लोग ऐसे हैं जो रात-दिन संस्कृति की दुहाई देते हैं। रात-दिन इसकी माला जपते हैं। संस्कृति की दुहाई देने वालों का जो सबसे बड़ा ठेकेदार है उसकी तो सारी बात ही संस्कृति से

प्रचार और हकीकत

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भारत-पाकिस्तान के बीच छोटी सी सैनिक झड़प ने देश की हिंदू फासीवादी सरकार के कई दावों की पोल खोल दी। इसमें सामरिक और राजनयिक दावे सभी थे। सामरिक तौर पर जहां कमजोर और छोटा सा

मोदी सरकार, छद्म युद्ध और युद्धविराम

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युद्ध विराम के बाद अब भारत और पाकिस्तान दोनों के शासक अपनी-अपनी सफलता के और दूसरे को नुकसान पहुंचाने के दावे करने लगे। यही नहीं, सर्वदलीय बैठकों से गायब रहे मोदी, फिर राष्ट्र के संबोधन के जरिए अपनी साख को वापस कायम करने की मुहिम में जुट गए। भाजपाई-संघी अब भगवा झंडे को बगल में छुपाकर, तिरंगे झंडे के तले अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ‘पाकिस्तान को सबक सिखा दिया’ का अभियान चलाएंगे।

देशभक्ति और झूठ का कारोबार

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पुरानी कहावत है कि युद्ध का पहला शिकार सच होता है। युद्ध में दोनों पक्ष अपनी जनता और बाकी दुनिया की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव अर्धसत्य और झूठ का सहारा लेत

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।