फासीवाद

नफरत, हिंसा और नस्लवाद

/hate-violnce-aura-rascism

हिटलर की आत्मा के भारत के भीतर यात्रा के 100 साल हो चुके हैं। एक ओर यह सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है तो दूसरी तरफ अब हर शहर की गलियों में ये मौजूद है। इनके प्रभाव में नफर

नेहरू, गांधी और हिन्दू फासीवादी

/neharu-gandhi-and-hindu-fascist

वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे। 

शासकों की लगाई आग में झुलसता असम

/shasakon-ki-lagai-aag-mein-jhulasata-asam

पिछले दिनों असम के कार्बी आदिवासी बहुल दो पहाड़ी जिलों में हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में 2 व्यक्ति मारे गये व दर्जनों घायल हो गये। ढेरों पुलिसकर्मी भी घायल हुए। पश्चिमी कार्

फिर ये बिलबिलाहट क्यों?

/phir-ye-bilbilahat-kyon

इन दिनों भारतीय प्रचार माध्यमों और संघी मानसिकता वाले लोग दीपू चन्द्र दास की हत्या पर बहुत दुःखी लग रहे हैं। हालांकि इन दोनों को दीपू चन्द्र दास से कोई लेना-देना नहीं है।

समूची शिक्षा को संघी बनाने की कवायद

/total-education-ko-snghi-banane-ki-kavaayad

2047 तक देश को विकसित बनाने की मोदी सरकार की नौटंकी जारी है। देश विकसित बने न बने पर देश के कानून जरूर विकसित भारत नाम के हो जायेंगे। इसी कड़ी में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक न

मॉब लिंचिंग का संगठित गिरोह

/mob-lynching-ka-sangthit-giroh

आजकल बांग्लादेश में हिन्दू युवक की मॉब लिंचिंग पर संघी संगठन-पूंजीवादी मीडिया सबने हंगामा कर रखा है। जब यह हंगामा चल ही रहा था उसी दौरान भारत में 3 युवकों की मॉब लिंचिंग

‘जी-राम-जी’ : मुंह में राम बगल में छुरी

/G-RAM-G-munh-mein-ram-bagal-mein-chhuri

मोदी सरकार ने आखिर में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम) का ‘राम नाम सत्य’ कर दिया। मनरेगा की जगह ‘वी बी-जी-राम-जी’ (विकसित V भारत B गारण्टी

भांति-भांति के मैकालेपुत्र

/bhanti-bhanti-ke-macaulay-sons

मैकालेपुत्र शब्द हिन्दू फासीवादियों का प्रिय शब्द है। वे अक्सर ही इसका इस्तेमाल करते रहते हैं, खासकर अपने विरोधी उदारवादियों के लिए। अभी हाल ही में संघी प्रधानमंत्री ने ए

अपनी जनता चुनती सरकार

/apani-public-choose-government

जिस सरकार को जनता ने चुना आज वही सरकार जनता को चुन रही है। सरकार दिल्ली में मस्ती में बैठी है और जनता खुद को जनता साबित करने की कवायद में जुटी है। चुनाव आयोग ने लगभग आधे

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।