उत्तराखंड उपनल संविदाकर्मियों का आंदोलन

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देहरादून/ उत्तराखंड में उपनल (उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड) के 22,000 से अधिक संविदा कर्मचारी लंबे समय से नियमितीकरण और समान वेतन की मांग कर रहे हैं। इस बीच अलग-अलग वक्त में उपनल संविदाकर्मियों ने संघर्ष किए हैं। वर्तमान समय में यह संघर्ष उपनल कर्मचारी संयुक्त मोर्चे के द्वारा चलाया जा रहा है।
    
9 नवम्बर को राज्य स्थापना दिवस के दिन देहरादून में मोर्चे द्वारा ऐलान किया गया कि यदि राज्य सरकार नियमितीकरण के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं करती तो 10 नवम्बर से कार्य बहिष्कार के साथ हड़ताल शुरू की जाएगी। 10 नवम्बर को मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जायेगा। 10 नवम्बर से संविदाकर्मी परेड ग्राउंड सड़क, देहरादून पर ध्यान दे रहे हैं। यह धरना 24 नवम्बर तक क्रमिक अनशन के रूप में चला। यह आमरण अनशन में बदला। मगर एक ही दिन में कांग्रेस के नेताओं के आश्वासन से आमरण अनशन खत्म करके फिर से क्रमिक अनशन शुरू किया गया।
    
उपनल संविदाकर्मियों में राज्य के सभी विभागों के उपनल के जरिए भर्ती किए हुए कर्मी हैं। यह अलग बात है कि इन उपनल संविदाकर्मियों की एक से ज्यादा यूनियन हैं। इस हड़ताल में भी सभी यूनियनें शामिल नहीं रहीं। 
    
दरअसल 2018 में नैनीताल हाईकोर्ट का फैसला आया जिसमें सरकार को उपनल कर्मचारियों को नियमित करने और समान वेतन देने का आदेश दिया गया था। लेकिन सरकार ने इसे लागू करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार सुप्रीम कोर्ट में भी हार गई। इसके बाद एक पुनर्विचार याचिका दायर की गई। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी, जिससे कर्मचारियों का आंदोलन और तेज हो गया। इस बीच इस फैसले को लागू करने के लिए आंदोलन शुरू हो गया।
    
संविदाकर्मियों का आंदोलन परेड ग्राउंड के अलावा और जगह भी चल रहा है। इनकी कुल संख्या 22,500 बताई जाती है। अगर कुल ठेके पर काम करने वाले कर्मियों की बात की जाय तो इनकी संख्या 50 हजार से ज्यादा होने की संभावना है जो अलग-अलग आउटसोर्स एजेंसियों के जरिए रखे गए हैं।
    
आंदोलन को खत्म करवाने के लिए सरकार ने जल्दबाजी में एक कमेटी गठित कर दी जो दो माह में इस संबंध में फैसला लेगी कि कैसे नियमित किया जाना है। मगर आंदोलनरत कर्मी सरकार की चाल को समझ गए और आंदोलन जारी रहा। इस बीच एक नया पैंतरा जो आंदोलन को कमजोर और खत्म करने के लिए है वह उमा देवी केस का हवाला देकर उपनल कर्मियों को नियमित नहीं किए जा सकने का तर्क देकर खड़ा किया जा रहा है। उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि अस्थाई कर्मचारी नियमित या स्थायी पद पाने का अधिकारी नहीं है। इस फैसले को हवा दी जा रही है। संभव है कि इसके जरिए कोर्ट में फैसले को चुनौती दी जाए।
    
भाजपा सरकार ने आंदोलन खत्म करने को एस्मा लागू कर दिया। मगर आंदोलन जारी रहा। हालांकि कुछ कमजोरी जरूर दिखी।
    
इस बीच नैनीताल कोर्ट में राज्य सरकार द्वारा अदालती निर्णय की अवमानना हेतु वाद संविदाकर्मियों की यूनियन की ओर से डाला गया। हाईकोर्ट ने गरम बातें करने के बाद नरम रुख अपनाया और सरकार को दो माह का समय दे दिया। अगली तारीख 12 फरवरी की दी। इस तरह कोर्ट की ओर से भी सरकार को काफी लंबा वक्त मिल गया। साथ ही कोर्ट में टिप्पणी भी की गई कि जब वाद न्यायालय में है तब इसके लिए सड़क पर हंगामा खड़ा करने की क्या जरूरत।
    
अब आखिरकार 25 नवंबर को सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बैठक हुई। इसमें तय हुआ कि 12 साल या उससे अधिक सेवा वाले कर्मचारियों को स्थायी के समान वेतनमान और भत्ते दिए जाएंगे। हालांकि जिनकी सेवा अवधि कम है, उनके लिए अभी कोई स्पष्ट नीति नहीं बनी है। इस तरह सरकार समान वेतन का झुनझुना थमा स्थायी करने से मुकर गयी। उपनल कर्मियों की यूनियन ने 12 वर्ष काम करने वालों हेतु समान काम का समान वेतन लागू करने के पत्र पर आंदोलन स्थगित कर दिया है। हालांकि अभी इस मामले में अस्पष्टता है कि समान काम का समान वेतन से क्या आशय है और यह कब से लागू होगा।      
    
यह हास्यास्पद है कि केवल विज्ञापनों में ही चंद सालों में 1000 करोड़ खर्च कर देने वाली सरकार का तर्क है कि यह स्थायीकरण वित्तीय बोझ है, इसके लिए पैसा कहां से आएगा।
    
जहां तक मौजूदा आंदोलन की बात है इसकी अपनी सबसे बड़ी सीमा है कि इसमें सभी यूनियनों का मोर्चा नहीं बना। साथ ही यह आंदोलन निजीकरण-उदारीकरण की उन नीतियों से बेपरवाह है जिसके चलते ये कर्मचारी सड़क पर हैं। ये उसी कांग्रेस के आश्वासन पर आमरण अनशन तोड़ देते हैं जिनके दौर में राज्य में उपनल कर्मियों की भर्तियां हुईं। फिलहाल क्या और कितना हासिल होगा यह आगे पता लगेगा। जहां तक 22,000 कर्मियों को नियमित करवाने का सवाल है तो इस तरीके के संघर्ष के दम पर जिसका मकसद और दृष्टि ही बेहद सीमित हो, इसे हासिल करना बेहद मुश्किल है भले ही कोर्ट का फैसला फिलहाल इन कर्मचारियों के पक्ष में आया हो।       -देहरादून संवाददाता
 

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