हिंदू फासीवादी और लद्दाख
केंद्र सरकार ने लद्दाख को नया झुनझुना थमाने की कोशिश की है। काफी पहले हिंदू फासीवादियों ने जम्मू कश्मीर के विभाजन और 370 के खात्मे से पहले भी इस इलाके की जनता को ढेरों झू
केंद्र सरकार ने लद्दाख को नया झुनझुना थमाने की कोशिश की है। काफी पहले हिंदू फासीवादियों ने जम्मू कश्मीर के विभाजन और 370 के खात्मे से पहले भी इस इलाके की जनता को ढेरों झू
हरियाणा में बीते लगभग डेढ़ माह से सफाईकर्मियों का जुझारू संघर्ष चल रहा है। इस संघर्ष में कभी चढ़ाव कभी उतार आता रहा है। पर सफाईकर्मियों खासकर महिला सफाईकर्मियों के जोश-उत्स
सूरत के टैक्सटाइल व कढ़ाई मजदूर अगस्त माह में सड़कों पर उतरे थे। वे प्रमुखता से रविवार अवकाष, 8 घंटे का काम व ओवरटाइम के दोगुने भुगतान की मांग कर रहे थे। तब एक ओर प्रशासन न
आजकल कोई चीज अगर सर्वव्याप्त है तो वह है कूड़े के ढेर। कूड़े के ढेर का कोई इतिहास तो मिलता नहीं। ये तो आधुनिक विकसित सभ्यता में ही पैदा हुआ है। सिन्धु घाटी सभ्यता बहुत विकस
इस वर्ष के दो लोकप्रिय जनउभार के पीछे बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी (बदहाल शिक्षा के साथ) ही थे। पहला जनउभार इस वर्ष के अप्रैल-मई माह में भारत के बेहद कम मजदूरी व बढ़ती महंगाई से हैरान-परेशान मजदूरों का था। और दूसरा जनउभार जून-जुलाई माह में छात्र-युवाओं का था जो बार-बार विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होने से परेशान थे।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के एकदम नजदीक सत्यनिकेतन नाम के एक पीजी की ईमारत ढहने की घटना ने देश की बदहाल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को एक बार फिर उघाड़ कर रख दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से जो भाषण दिया उस पर जंतर-मंतर संघर्ष की स्पष्ट छाप थी। जेन जी को भरमाने के लिए मोदी ने देश के विकास की झूठी गाथा के साथ मुफ्त
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।