पार्क में एक रोज बेंच पर बैठे एक व्यक्ति से भेंट हो गई। उसके बाद का वार्तालाप।
मैंः हैलो! आपका नाम
व्यक्तिः दिमागी नक्सल
मैंः क्या? पागल
व्यक्तिः हां, ये भी कह सकते हो।
मैंः क्यों मजाक करते हो भाई? सही-सही बताओ ना, कौन हो भाई?
व्यक्तिः मां-बाप ने तो चंद्रशेखर नाम रखा था, गांव के लोग मुझे चंदू कहते थे।
मैंः अच्छा तो आपका नाम चंद्रशेखर है।
व्यक्तिः हां ये भी है मगर आजकल मुझे और कई नाम से भी जाना जाता है, कभी वामपंथी, कभी आंदोलनजीवी, कभी अरबन नक्सल तो कभी दिमागी नक्सल कहकर बुलाया जाता है।
मैंः आप रहते कहां हैं?
व्यक्तिः मैं स्कूल में रहता हूं, लायब्रेरी में रहता हूं, शहर में रहता हूं, गांव में रहता हूं, खेत-खलिहान मे रहता हूं। देश में रहता हूं और विदेश में रहता हूं। प्रेस में रहता हूं, कारखानों में रहता हूं और न्यायालयों मे भी रहता हूं।
मैंः आखिर आप करते क्या हैं?
व्यक्तिः मैं पढ़ता हूं पढ़ाता हूं, खेती-किसानी करता हूं, मैं कारखानों में मशीनें चलाता हूं, देश-विदेश में नौकरी करता हूं, कोर्ट में वकालत करता हूं, अखबार में लिखता हूं।
मैः फिर आपको इतने नामों से क्यों बुलाया जाता है?
व्यक्तिः क्योंकि मैं सोच सकता हूं, लिख सकता हूं और सरकारों की आंख में आंख डालकर सवाल पूछ सकता हूं। सबसे बड़ी बात मैं अंधभक्त नहीं हूं।
-एक पाठक