ग्रेट व्हाइट ग्लोबल कम्पनी के मजदूरों का संघर्ष

/gret-white-global-company-ke-workers-ka-struggle

हरिद्वार/ हरिद्वार के निकट लक्सर क्षेत्र में धनपुरा में 2004 से स्थापित ग्रेट व्हाइट ग्लोबल कम्पनी में इलेक्ट्रिक पार्ट्स का काम होता है। यहां 1700 मजदूरों में से 80 प्रतिशत महिलाएं हैं। मजदूर 14-15 सालों से कम्पनी की ओर से काम कर रहे हैं परन्तु उन्हें आज तक नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है। 11,000 रुपये प्रतिमाह वेतन देकर शोषण किया जा रहा है। 8 मजदूरों का गेट इसलिए बंद किया गया है कि उन्होंने अपने हक की बात की। 
    
इससे पहले 9 अप्रैल को कुछ महिला मजदूरों ने स्थायी नियुक्ति पत्र की मांग की तो प्रबंधक वर्ग द्वारा उन्हें उलटा-सीधा कहकर चुप करा दिया गया। 10 अप्रैल को मजदूरों द्वारा धरना दिया गया। हरिद्वार से संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों द्वारा समर्थन देने ग्रेट व्हाइट कम्पनी धनपुरा में जाया गया। श्रम विभाग रोशनाबाद में ग्रेट व्हाइट मजदूरों की कमेटी ने 12 सूत्रीय मांग पत्र प्रदर्शन कर सौंपा। 
    
सहायक श्रमायुक्त महोदय हरिद्वार ने 16 अप्रैल को 3ः00 बजे त्रिपक्षीय वार्ता रखी है। इससे पूर्व में भी ग्रेट व्हाइट के मजदूरों ने स्थायी होने के लिए संघर्ष किया परन्तु भारतीय मजदूर संघ के नेताओं द्वारा मजदूरों के साथ धोखा किया गया। इस बार के संघर्ष में मजदूरों का नेतृत्व संयुक्त संघर्षशील ट्रेड यूनियन मोर्चा हरिद्वार के पदाधिकारियों ने किया। सर्वप्रथम एक सात सदस्यीय मजदूर कमेटी का गठन किया गया। और इसी मजदूर कमेटी के नाम से संयुक्त मांग पत्र लगाया गया है। 
        -हरिद्वार संवाददाता

आलेख

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।