साम्राज्यवाद तेरी कब्र खुदेगी एशिया की धरती पर

Published
Sun, 03/01/2026 - 06:01
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ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला

अंततः लम्बी घेरेबंदी के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों व इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला बोल दिया। अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने आपरेशन इपिक फ्यूरी नामक इस हमले का उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियारों से वंचित करना बताया है। 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल ने कई मिसाइली हमले ईरानी नेताओं के आवास को निशाना बनाते हुए किए। इन हमलों में ईरान के शीर्ष नेता खामेनेई मारे गये। एक मिसाइल हमले में ईरान में 53 स्कूली बच्चों के मारे जाने की खबर है। प्रत्युत्तर में ईरान ने भी इजरायल व 8 अरब देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाते हुए हमला बोला है। 
    
अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने हमले के बाद एक ओर ईरानी हुकूमत को 10 दिन के भीतर अमेरिकी मांगों को स्वीकारने का अल्टीमेटम दिया, वहीं दूसरी ओर उसने ईरानी जनता से तख्तापलट का आह्वान करते हुए कहा कि उनकी आजादी नजदीक है और उन्हें सरकार पलटने का ऐसा मौका लम्बे वक्त तक नहीं मिलेगा। स्पष्ट है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी किसी भी कीमत पर खामेनेई हुकूमत को अपदस्थ करना चाहते हैं और परमाणु हथियार तो महज बहाना है। दुष्ट ट्रम्प खामेनेई के तख्तापलट के अपने उद्देश्य को खुलेआम घोषित भी कर रहा है। उसे अब किसी पर्दे-बहाने की भी जरूरत नहीं है। यह युद्ध क्षेत्रीय युद्ध में बदलने की संभावना भी लिए हुए है। 
    
रमजान के महीने में अमेरिकी साम्राज्यवाद-इजरायल का यह हमला बेहद अन्यायपूर्ण युद्ध की शुरूआत है। अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने पहले वेनेजुएला की सम्प्रभुता को तार-तार कर उसके राष्ट्रपति का अपहरण कर लिया और अब एक गरीब मुल्क ईरान की सत्ता बदलने के लिए उस पर हमला बोल दिया। नये वर्ष में अमेरिकी साम्राज्यवादी बदहवास हो गये हैं। वे अपनी दादागिरी बचाने के लिए देशों की सम्प्रभुता को रौंद रहे हैं। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवाद के इस नापाक हमले के विरोध में सभी देशों की मजदूर-मेहनतकश जनता को खड़े होने की जरूरत है। केवल अमेरिका समेत दुनिया की मेहनतकश जनता की व्यापक पहलकदमी ही ट्रम्प के हत्यारे मंसूबों को रोक सकती है। यह पहलकदमी न केवल इस युद्ध को रोकने के लिए होनी चाहिए बल्कि साम्राज्यवाद के समूल नाश को प्रेरित होनी चाहिए। साम्राज्यवाद का अर्थ ही है युद्ध। केवल व केवल साम्राज्यवाद का अंत करके ही स्थायी शांति कायम हो सकती है। 

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।