‘झूठ बोलने वालों की याददाश्त अच्छी होनी चाहिए’

यह एक डच कहावत है। झूठ बोलने वाले की याददाश्त अच्छी नहीं होगी तो जल्द ही पकड़ा जायेगा। वह तभी पकड़ा जा सकता है जब उसको पकड़ने वालों की याददाश्त भी अच्छी हो। अन्यथा झूठ बोलने वाला झूठ बोलता जायेगा और कभी नहीं पकड़ा जायेगा। 
    
कुछ ऐसा ही मोदी जी के साथ है। वह एक के बाद एक झूठ बोलते हैं परन्तु हैरत की बात है पकड़े जाने पर वह कभी माफी नहीं मांगते बल्कि अगली बार फिर एक नया झूठ बोल देते हैं। असल में तो मोदी का मूल मंत्र है, ‘‘झूठ बोलो, बार-बार झूठ बोलो, जितना हो सके उतना झूठ बोलो...’’। वैसे उन्होंने ऐसा अपने विरोधियों के लिए कहा था परन्तु समय ने साबित किया कि यह तो उनके ही जीवन का मूल मंत्र है। उनकी शिक्षा-दीक्षा, भ्रमण, विवाह, बचपन-जवानी आदि के बारे में उनके द्वारा समय-समय पर खुद ही झूठ फैलाये गये। 
    
डच कहावत मोदी के बारे में सच हो सकती है परन्तु उनके अनुयाइयों के लिए शायद ही सच हो। और विरोधी तो जो कुछ ताक में रहते हो परन्तु गूगल के जमाने में मोदी के झूठ की पोल तुरन्त खुल जाती है। इधर मोदी ने मनमोहन सिंह के बारे में कुछ बोला उधर लोगों ने उसकी पड़ताल कर डाली।

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।