उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन निविदा संविदा कर्मचारी संघ का संघर्ष

बदायूं/ उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन निविदा संविदा कर्मचारी संघ के कर्मचारी 8 फरवरी 2023 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। कर्मचारियों ने अधीक्षण अभियंता कार्यालय बदायूं पर अपना आंदोलन शुरू कर दिया। ये सभी कर्मचारी जनपद बदायूं के विद्युत वितरण खंडों के अंतर्गत 33/11 के वी विद्युत उपकेंद्रों एवं विद्युत लाइनों के रख-रखाव हेतु निगम मुख्यालय द्वारा एक मैन पावर सप्लायर कंपनी से किए गए अनुबंध के तहत रखे गए थे। यह अनुबंध 10 मई 2019 को किया गया था। जिस कंपनी से अनुबंध हुआ उसका नाम मैसर्स ओरियन सिक्योरिटी सॉल्यूशन प्रा. लिमिटेड है। इसका पता 5- ई प्रथम तल लेन संख्या- 5. जुगी हाउस शाहपुर जाट, नई दिल्ली दर्ज है। इस कंपनी ने आउट सोर्स के माध्यम से इन लोगो को काम पर रखा था। इन कर्मचारियों की संख्या लगभग 900 है।

यह कंपनी इन कर्मचारियों का एक माह से लेकर दो माह का वेतन और पी एफ की राशि लेकर भाग गई। कर्मचारियों के अनुसार कंपनी ने लगभग 3 करोड़ 50 लाख का चूना लगाया है। कर्मचारी जब भी अपने बकाया पैसों की मांग करते हैं तो उनका उत्पीड़न किया जाता है। स्थानीय अधिकारियों से लेकर मुख्यालय तक इन्होंने अपनी समस्याओं को हल करने के लिए गुहार लगाई। लेकिन इनकी कहीं भी नहीं सुनी गई। कुछ लोगों का यह भी कहना था कि जिस उक्त कंपनी के तहत उन्हें रखा गया है, वह कंपनी भाजपा सरकार के एक बड़े नेता ही चला रहे हैं। और उस पर भी मजे की बात है कि कर्मचारियों की जो यूनियन बनी हुई है, उसके संरक्षक भाजपा सांसद कौशल किशोर हैं। इसके अलावा एक संरक्षक हिंदू युवा वाहिनी उत्तर प्रदेश के अशोक सिंह हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। कि मजदूरों-कर्मचारियों को बेवकूफ बनाने का कितना बड़ा षड्यंत्र किया जा रहा है।

जब कर्मचारियों की बात कहीं नहीं सुनी गई तो उन्होंने 8 फरवरी से अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। इस दौरान कर्मचारियों ने जिले के प्रशासनिक अधिकारियों से भी बात की। कर्मचारियों का शोषण-उत्पीड़न फिर भी जारी रहा। लेकिन इसके बाद भी कर्मचारी पूरी ताकत और एकजुटता के साथ संघर्ष के मैदान में डटे रहे। कर्मचारी मांग कर रहे थे कि जिस कंपनी ने इतना बड़ा गबन किया है उसे काली सूची में डालकर उस पर मुकदमा लिखा जाए। और उनका जो भी पैसा बकाया है, उसका भुगतान किया जाए। इस आंदोलन को शहर के दूसरे संगठनों का भी समर्थन मिलने लगा है। क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, भारतीय किसान यूनियन, यू पी डेमोक्रेटिक फोरम ने समय-समय पर जाकर संघर्षरत कर्मचारियों का हौंसला बढ़ाने का काम किया और कर्मचारियों के संघर्ष को समर्थन दिया।

कर्मचारियों का यह संघर्ष अधीक्षण अभियंता कार्यालय पर रोजाना सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चलता था। इस आंदोलन को चलाने के लिए कर्मचारी स्वयं ही आपस में चंदा इकट्ठा करके आंदोलन के खर्चे निकालते थे। कर्मचारी धरना स्थल पर ही रोजाना दोपहर का भोजन भी बनाते और सामूहिक भोज करते थे। ये सामूहिक भोज मजदूरों-कर्मचारियों के बीच उनकी सामूहिकता को भी प्रतिबिंबित करता था। रोजाना दोपहर में सभा भी चलती थी। जिसमें वे अपनी-अपनी बात भाषणों और शेरो-शायरियों के माध्यम से रखते। अलग-अलग लोग संचालन का जिम्मा संभालते। बिजली कर्मचारियों का यह आंदोलन वर्गीय एकता का नमूना था। इस वर्गीय एकता और संघर्ष का ही परिणाम था कि कर्मचारियों ने 16 वें दिन 23 फरवरी 2023 को अंततः आंशिक जीत हासिल की। संघर्ष की बदौलत ही मैन पावर सप्लायर कंपनी के खिलाफ धारा 420 सहित कुछ अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया और आश्वासन दिया गया कि निगम मुख्यालय द्वारा कर्मचारियों के बकाए का जल्द भुगतान करा दिया जाएगा।

इसके बाद उत्साह के साथ कर्मचारियों ने 23 फरवरी को अपना आंदोलन इस बात पर स्थगित किया कि अगर उनकी समस्याओं का जल्द समाधान नहीं होता तो पुनः संघर्ष के मैदान में उतरेंगे।

सारे ही सार्वजनिक संस्थाओं की तरह बिजली विभाग में भी अधिकतर काम ठेका, संविदा या आउट सोर्स कर्मचारियों से ही कराए जाते हैं। इन कर्मचारियों का कंपनी से लेकर विभागीय अधिकारी तक शोषण-उत्पीड़न करते हैं। छोटी-छोटी बातों पर काम से हटाने की धमकियां दी जाती हैं। विभाग और कंपनी के बीच जो आर्थिक गोरख धंधा होता है, उसमें सरकारों के मंत्री तक शामिल रहते हैं। इन चीजों के खिलाफ मजदूरों-कर्मचारियों में आक्रोश ना फैले, कर्मचारी मजदूर वर्ग की राजनीति की ओर ना चले जाएं और संघर्ष को लुटेरे लोगों के खिलाफ ना खड़ा कर दें इसीलिए पिछले समयों में शासक वर्गीय सत्ताधारी पार्टी ने अपने लोगां या अपने से जुड़े कट्टरपंथी संगठनों के लोगों को मजदूरों-कर्मचारियों की यूनियन में पहुंचाने का काम बड़े ही शातिराना ढंग से किया है। इन लोगों का यूनियनों में यही काम होता है कि ये लोग संघर्ष को सही दिशा में नहीं जाने देते। पूरे संघर्ष को अधिकारियों के खिलाफ मोड़ने की कोशिश करके सरकार और उसके नुमाइंदों को बचा ले जाते हैं और लूट का सिलसिला जारी रहता है। इसके अलावा सत्ताधारी लोग और उनके संगठन यूनियन में शामिल होकर यूनियन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक स्वार्थ पूरे करने और आजकल तो फासीवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में भी करने की कोशिश करते हैं।

आज मजदूरों-कर्मचारियों के सामने ये दोहरी चुनौती है कि कैसे वे संघर्ष करके अपनी समस्याओं को हल करते हैं। और कैसे अपने संगठनों को शासकों का मोहरा बनने से रोकते हैं। बिजली कर्मचारियों के सामने ये विकराल समस्या है। एक तो उनका बकाया सारा पैसा उन्हें मिले। दूसरी बात जब इसी वर्ष मार्च में दूसरा टेंडर होगा तो इन कर्मचारियों की क्या स्थिति होगी। कोई दूसरी कंपनी अगर आती है तो उन्हें काम पर रखती है या नहीं। इसके लिए इन्हें संघर्ष करना होगा। इसलिए दूरगामी तौर पर जरूरत बनती है कि वे प्रदेश स्तर पर लड़ाई को संगठित करें और मांग करें कि प्रदेश में लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं जिन्हें आउट सोर्स पर रखा गया है, इन्हें स्थाई किया जाए। विभाग इनको अपने अधीन ले। ये लड़ाई ठेका प्रथा, संविदा, निविदा के ही खिलाफ होगी और निजीकरण के खिलाफ होगी। इसके लिए एक बड़ी एकता के साथ जुझारू संघर्ष की जरूरत है। इस संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए इन सभी कर्मचारियों को व्यापक एकता बनाकर खुद को मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी विचारधारा से लैस करना होगा। तभी सही मायने में ये अपने दोस्तों की पहचान कर संघर्ष को आगे बढ़ा पाएंगे। -बदायूं संवाददाता

आलेख

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।