कोई ऊंट को पहाड़ तो दिखाये

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मोदी सरकार इस वक्त भारत की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था का गुणगान करती रहती है और दावा करती है कि वह अगले दो-तीन वर्षों में दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगी। क्या भारत के मजदूर- मेहनतकशों को मोदी सरकार की इस तरह की बातों या दावों से खुश होना चाहिए। हकीकत यह है कि ये बातें या दावे महज आंकड़ों के खेल हैं। मोदी सरकार की बातों व दावों की हकीकत को समझने के लिए यहां एक तालिका दी जा रही है। दुनिया की पहली पांच अर्थव्यवस्थाओं व पांच कम्पनियों की तुलना की जा रही है। अर्थव्यवस्था
    
दोनों तालिकाओं से स्पष्ट है कि दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी नविडिया दुनिया की पहली दो अर्थव्यवस्थाओं को छोड़कर अपने आकार में सबसे बड़ी है। भारत की अर्थव्यवस्था से बड़ी नविडिया दुनिया में कितनी ताकत रखती होगी इसे आसानी से समझा जा सकता है। दुनिया की पांचों बड़ी कम्पनियां स.रा.अमेरिका की हैं। अमेरिका की ताकत सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था के बड़े आकार व सैन्य ताकत में ही नहीं बल्कि उसका दबदबा उसकी एकाधिकारी कम्पनियों के कारण भी है। तकनीक के क्षेत्र में भी वह बहुत आगे है। 
    
प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में है। दुनिया के 193 देशों में उसका स्थान 136वां और अगर क्रय शक्ति तुल्यता (पीपीपी) के आधार पर देखा जाए तो उसका स्थान 119वांअर्थव्यवस्था है। 
    
भारत में मोदी सरकार और उसके चाटुकार एक तरह के आंकड़ों पर खूब शोर मचाते हैं और दूसरी तरह के आंकड़ों पर चुप साध जाते हैं। 

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।