दाल में कुछ तो काला है

हरियाणा में इस समय विधान सभा चुनाव चल रहे हैं। इसी दौरान भाजपा ने चरखी दादरी विधान सभा सीट से पूर्व जेलर सुनील सांगवान (इन्होंने 1 सितंबर को ही अपने जेल अधीक्षक के पद से इस्तीफा दिया है) को टिकट दिया है। सुनील सांगवान को टिकट मिलते ही इनके बारे में एक चर्चा विशेष रूप से सामने आयी। इस चर्चा ने सुनील सांगवान, भाजपा और राम रहीम को एक सूत्र में पिरोने का काम किया।
    
दरअसल पिछले सालों में राम रहीम को करीब 10 बार पैरोल या फरलो मिली है। इन 10 बार में से 6 बार पैरोल या फरलो दिलाने में जेलर रहे सुनील सांगवान की भूमिका रही है। ज्ञात रहे राम रहीम साध्वियों के साथ बलात्कार और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में सजा काट रहे हैं।
    
हालांकि सुनील सांगवान यह दावा करते रहे हैं कि उनका राम रहीम को पैरोल या फरलो दिलाने में कोई सहयोग नहीं रहा है लेकिन यह बात पूरी तरह सच नहीं है।
    
दरअसल हरियाणा सदाचारी बंदी (अस्थायी रिहाई) अधिनियम के तहत जेल अधीक्षक की सिफारिश पर ही जिला मजिस्ट्रेट पैरोल या फरलो की याचिका को मंज़ूरी देता है। अब ऐसे में सुनील सांगवान राम रहीम को पैरोल या फरलो दिलाने में अपनी भूमिका से बच नहीं सकते। इसके अलावा जब 2017 में राम रहीम पर आरोप पत्र तय करके रोहतक की सुनरिया जेल में भेजा गया था तब सुनील सांगवान ही सुनारिया जेल के जेलर थे।
    
सुनील सांगवान के पिता पूर्व राजस्व एवं सहकारिता मंत्री सतपाल सांगवान भी इस समय भाजपा के नेता हैं। वे लोक सभा चुनाव से पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे। सुनील सांगवान ने जब 1 सितम्बर को अपने पद से इस्तीफा दिया तो उसी दिन जेल महानिदेशक ने रविवार को ही सभी जेलों के अधीक्षकों को पत्र लिखकर सुनील सांगवान को उसी दिन ‘नो ड्यूज’ सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया ताकि सुनील सांगवान चुनाव लड़ सकें। भाजपा सरकार की यह जल्दबाजी दिखाती है कि सुनील सांगवान उनके लिए कितना कीमती हैं।
    
भाजपा सरकार की नजर में राम रहीम की भी एक खास कीमत है जिसके लिए भाजपा की खट्टर सरकार ने कैदियों को दी जाने वाली पैरोल या फरलो के नियम बदलने के लिए नया कानून ही बना दिया था। और हाईकोर्ट द्वारा राम रहीम को हत्या के केस में बरी करना भी दिखाता है कि सरकार के साथ न्यायपालिका भी राम रहीम पर कितनी मेहरबान है या इसे यह भी कह सकते हैं कि राम रहीम का कितना बड़ा रसूख है।
    
अब अगर सुनील सांगवान, भाजपा और राम रहीम को एक साथ रखकर देखें तो दाल में कुछ काला जरूर है। और यह कालापन पहले भी कई मामलों में विभिन्न पदों पर तैनात रहने के बाद लोगों को भाजपा द्वारा पुरस्कृत करने में दिखाई दिया है।

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