कठिन जिन्दगी

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मैं 23 जुलाई को अपने सेल्स कार्य के लिए रुद्रपुर गया। वहां विकास खण्ड अधिकारी से बात करनी थी लेकिन पंचायत चुनाव के कारण उनसे मुलाकात नहीं हो पायी। मैं पैदल लौट रहा था। मैंने सड़क के किनारे दो व्यक्तियों को बैठा देखा। मैं पास गया तो वहां जमीन पर एक दरी पर चुनाव चिन्ह दिखायी दिये। विभिन्न ईंटें, कुल्हाड़ी, इमली, उगता सूरज, कछुआ, दीया अन्य। कुछ गत्तों पर थे, कुछ पर नाम-स्थान भी लिखा था, कुछ प्लास्टिक के थे गोल जो कमीज-जेब के ऊपर पेन से लगाये जाते हैं। मैंने उनसे पूछा कि आप लोग इनको लेकर यहां क्यों बैठे हो? ये चिन्ह तो प्रधान व पंचायत सदस्य बनवाते हैं- आपसे कौन इन्हें लेगा?
    
वह बोले कि चुनाव चिन्ह व पर्चा एकदम प्रत्याशी को नहीं मिल पाता है। इसलिए हमसे खरीद कर इसमें अपना नाम लिखवा लेते हैं। इससे हमें रुपया मिल जाता है। 
    
उनसे पूछा कि आप कहां से आये हो तो एक व्यक्ति ने कहा कि मेरा नाम ब्रज बिहारी है। ये मेरे साथी हैं। हम लोग गोरखपुर से यहां आये हैं। एक होटल के कमरे का 700 रुपये रोज किराया देते हैं। खाना होटल से खरीद कर खाते हैं। मैंने कहा मेज में क्यों नहीं सजाया? 
    
वह बोले, मेज का 50 रुपये रोज का किराया है। अर्थव्यवस्था ढीली होने के कारण जमीन पर रखा है। गोरखपुर से यहां रुद्रपुर आये तो क्या वहां यह कार्य नहीं हो पाता है? उन्होंने कहा समय-समय की बात है। वहां कार्य करके पेट भोजन पूरा नहीं हो पाता है। तभी यहां भी 15 दिन के लिए आये हैं। आजकल प्रिटिंग प्रेस वाले भी जल्दी छपवा देते हैं। इससे हमारा व्यापार बहुत कम हो गया है लेकिन जीवन जीने के लिए हम मजबूर हैं। 
    
दोस्तो व्यापार की हालत भी कमजोर हो गयी है। अगर साम्प्रदायिकता वालों की नजर में यह आ गये तो क्या यहां ये कार्य कर पायेंगे इसलिए हर एक कार्य में उन्नति न होकर गिरावट है। पढ़े-लिखे लोगों को नौकरी नहीं व्यापारियों का मुनाफा भी खत्म हो रहा है। -टी आर पाण्डे

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।