एक रुपया सालाना लीज पर जमीन

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मोदी सरकार ने अपने मित्र गौतम अडाणी को एक गिफ्ट और दे दिया है। देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक गौतम अदाणी की कंपनी अदाणी पावर लिमिटेड को सरकार ने थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए 1050 एकड़ जमीन 1 रुपए वार्षिक लीज पर 25 सालों के लिए दे दी है।
    
दरअसल बिहार में पटना से तकरीबन 250 किलोमीटर दूर भागलपुर के पीरपैंती की इस जमीन पर अडाणी की नजर लंबे समय से थी। इसके लिए सरकार ने वर्ष 2012 के आस-पास पीरपैंती की पांच पंचायतों के 900 किसानों की 988.33 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। फरवरी 2025 में बिहार सरकार ने नए सिरे से भागलपुर के पीरपैंती में 2400 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट लगाने की परियोजना प्रस्तावित की थी। राज्य सरकार ने तय किया कि यह थर्मल प्लांट टैरिफ बेस्ड काम्पिटिटिव बिडिंग (यानी बोली की प्रक्रिया) के जरिए लगाया जाएगा।
    
इस बोली प्रक्रिया में लगभग 4 कंपनियां थीं। लेकिन बिजली बेचने के लिए अडाणी ने सबसे कम कीमत की बोली लगाई। जुलाई 2025 को आनलाइन नीलामी में बिजली बेचने के लिए अडाणी की कंपनी अडाणी पावर लिमिटेड ने सबसे कम कीमत यानी 6.075 रुपये (छह रुपये साढ़े सात पैसे) प्रति यूनिट (किलोवाट-घंटा) की बोली लगाकर यह प्रोजेक्ट अपने नाम कर लिया।
    
अडाणी पावर लिमिटेड के बोली जीतने के करीब 20 दिन बाद अगस्त 2025 को बिहार राज्य कैबिनेट की बैठक हुई। इस कैबिनेट ने फैसला लिया कि अडाणी समूह को थर्मल पावर प्लांट के लिए करीब 1050 एकड़ जमीन एक रुपए सालाना की लीज पर दी जाएगी।
    
किसानों से यह जमीन बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथारिटी के नाम पर ली गई थी। जिसे अथारिटी ने विद्युत विभाग को दे दिया। इस पर सरकार का कहना है कि बिहार में बिजली की जरूरत को समझते हुए सरकार ने कई जगहों पर थर्मल पावर प्लांट बनाने का संकल्प लिया था। इसी के तहत पीरपैंती में जमीन का अधिग्रहण किया गया।
    
पीरपैंती की यह जमीन कोई बंजर या बिना उत्पादकता वाली नहीं है बल्कि इन किसानों का जीवन इसी जमीन से खेती करके चलता था और इसी जमीन पर किसानों ने 10 लाख आम, लीची और सागवान के पेड़ लगा रखे हैं। इन पेड़ों की संख्या 2013 में गिनी गई थी और अब 2025 चल रहा है। पेड़ों की संख्या और बढ़ गई होगी। थर्मल पावर प्रोजेक्ट की बोली लगाने से जुड़े एक सरकारी दस्तावेज के मुताबिक अधिग्रहित की गई करीब 400 एकड़ जमीन में लगभग तीन लाख पेड़ हैं। जब यहां पर पावर प्लांट लगेगा तब ये पेड़ भी काट दिए जाएंगे। इन आम और लीची के पेड़ों से हर साल किसानों को आमदनी होती थी वह भी खत्म हो जाएगी और इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काटने से पर्यावरण को नुकसान होगा वह अलग। इसके जवाब में सरकार बोल रही है कि इतने सारे पेड़ काटने के बदले में 100 एकड़ में कम्पल्सरी फोरेस्टेशन के तहत ग्रीन बेल्ट विकसित की जाएगी। अब यह कितना होगा या नहीं होगा समय ही बताएगा। 
    
यह जमीन किसानों से जबरदस्ती खाली कराई गई। जिसका किसानों को न तो उचित मुआवजा दिया गया और जो मुआवजा घोषित भी किया गया वह अभी तक पूरा पैसा किसानों को नहीं दिया गया है। इसके अलावा कुछ किसानों के घर भी इसमें आ रहे थे न ही उनको पुनर्वास के लिए घर दिया गया। किसान परिवारों को उजाड़कर मोदी के एक मित्र को मुनाफा कमाने के लिए बसा दिया गया है। 
    
वहां के किसान अभी भी इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि हम किसी भी सूरत में अपना घर छोड़कर नहीं जाएंगे। सरकार को पहले हमारा पुनर्वास करना होगा, जिसकी कोई बात ही नहीं कर रहा है। नेता, मंत्री इस परियोजना का उद्घाटन करने आए और फीता काटकर सीधा चले गए। जिन्हें बेघर किया जा रहा है, उनसे मिलने, कोई बात करने नहीं आया। पीरपैंती के लोगों का कहना है कि विकास की रफ्तार अगर उनके आंगन उजाड़कर गुजरेगी तो ये सौदा उन्हें मंजूर नहीं है।
    
ये कैसा विकास है? जिसमें किसानों की जमीन को छीन लिया गया किसानों को उनके घर से बेदखल कर दिया गया। और तो और यह भी कहा जा रहा है कि इस प्लांट से बिहार सरकार को सालाना 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा और इलाके में जल संकट की स्थिति भी बनेगी। तो यह किसका विकास हो रहा है और किसके लिए विकास हो रहा है? क्या एक व्यक्ति के लिए इतने सारे लोगों के जीवन को तबाह-बर्बाद करना विकास कहा जाता है?
    
यह सोचना होगा कि अडाणी-अंबानी जैसे बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे की कीमत देश की मजदूर मेहनतकश जनता कब तक उठाती रहेगी। या देश की मजदूर-मेहनतकश जनता एकजुट होकर इन चंद पूंजीपतियों के खिलाफ संघर्ष को तेज करेगी और इन पूंजीपतियों को नेस्तनाबूद कर अपना समाज बनायेगी।
 

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