संघी संगठनों का एक और हमला और उसके खिलाफ प्रतिरोध

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बदायूं/ पूरे देश को संघी फासीवादी अपनी करतूतों से देश को अराजकता और दंगों की आग में झोंक रहे हैं।
    
हिंदू फासीवादियों के हमले मस्जिदों, ईदगाहों से होते हुए चर्चों और बौद्ध मठों, बुद्ध विहारों तक पहुंच गए हैं। अल्पसंख्यकों को दुकानें, मकान, किराए पर ना देने, सामान ना खरीदने के आह्वान खुलेआम हो रहे हैं। ये हमले अब धर्मस्थलों से बस्तियों तक विस्तारित हो गए हैं। मणिपुर लगभग दो साल से जल रहा है। वहां बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो रहा है। लेकिन संघी संगठन इससे विजयरूपी गर्व महसूस कर रहे हैं। धर्म के नाम पर हत्याएं, बलात्कार, बस्तियां जला देना आम होता जा रहा है। हम बीसवीं सदी के जर्मनी और इटली के फासीवाद और नाजीवाद की झलक अपने देश में महसूस कर सकते हैं। जिसे हर न्याय पसंद, लोकतांत्रिक और जनवादी व्यक्ति महसूस भी कर रहा है।
    
हिंदू फासीवादी हमलों की इस कड़ी में ही उत्तर प्रदेश के जनपद बदायूं में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के गुंडों ने हमला किया। यह हमला बदायूं शहर से सटे मंझिया गांव स्थित बुद्ध विहार में हुआ। जहां बौद्ध मठ भी है।
    
7 दिसंबर 2024 को बुद्ध विहार मझिया में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोगों ने बुद्ध विहार एवं सम्राट अशोक बुद्ध पर्यटक स्थल में बुद्ध विहार पर कब्जा करने की नीयत से बुद्ध विहार के अंदर और प्रांगण में खुर्दबुर्द की तथा बौद्ध भिक्षुओं को बुद्ध विहार से बाहर निकाल दिया। इस कार्यवाही में पुलिस प्रशासन गुंडों की मदद कर रहा था। बौद्ध धर्म गुरुओं से बदतमीजी की गई। उन्हें अपमानित किया गया, पुलिस ने इनको हिरासत में रखा।
    
बौद्ध समुदाय को जब उक्त घटना का संज्ञान हुआ तो बौद्ध समुदाय ने शासन-प्रशासन को 8 दिसंबर 2024 को ज्ञापन दिया। मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा महासभा के लोग सक्रिय हुए। वे मालवीय आवास गृह पर आंदोलन करना चाहते थे। लेकिन स्थिति को भांपकर भाजपा ने अपनी पूरी मौर्य, शाक्य जाति के नेताओं को इस मामले को शांत करने में लगा दिया। दोपहर तक तमाम नेता मालवीय आवास पहुंच गए। जिस बात का शक था वही हुआ। भाजपा नेता के बहकावे में संघर्ष करने वाले लोग आ गए। भाजपा नेताओं ने कहा कि हम दो दिन में सब ठीक करा देंगे, उन्होंने घटना को भी गलत माना। इस आश्वासन पर संगठनों के लोग मान गए। दो दिन का समय देकर चले गए।
    
लेकिन चार दिन तक उक्त घटना का प्रशासन ने कोई संज्ञान नहीं लिया। भाजपा नेताओं ने भी हाथ खड़े कर दिए। इस घटना ने इस बात को भी साबित कर दिया कि एक फासीवादी पार्टी में जातीय नेताओं की क्या औकात है। तब बौद्ध भिक्षुओं ने, अपने उपासकों के साथ 12 दिसंबर 2024 से जिला मुख्यालय बदायूं में कचहरी के सामने मालवीय आवास गृह पर अनिश्चितकालीन धरना देना शुरू कर दिया।
    
इस आंदोलन में मौर्य, शाक्य, कुशवाहा, सैनी महासभा के पदाधिकारी गण, बोधिसत्व बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर सम्राट अशोक बुद्ध पर्यटन स्थल संरक्षण संघर्ष मंडल मझिया, राष्ट्रीय दलित पिछड़ा अल्पसंख्यक महासंघ, बी.एस.आई., बुद्ध रिसर्च सेंटर, भारतीय बौद्ध महासभा, डा. आंबेडकर जन्मोत्सव समारोह समिति, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, जनहित सत्याग्रह मोर्चा एवं अन्य संगठन समय समय पर सहयोग, समर्थन करते रहे।
    
16 दिसंबर 2024 को एक बड़ी विरोध सभा की योजना बनी। इसमें तमाम संगठनों का समर्थन रहा। इस सभा में बड़ी संख्या में अलग-अलग जगहों से बौद्ध धर्म गुरू आए। तथा बदायूं शहर व आस-पास के इलाकों से लगभग तीन हजार लोगों ने भागीदारी की। इस सभा को प्रातः 11 बजे से शाम लगभग 5 बजे तक चलाया गया। धर्म गुरुओं से लेकर तमाम संगठनों, पार्टियों के प्रतिनिधियों ने सभा को संबोधित किया। सभी ने एक स्वर में संघी संगठनों के इस कृत्य का विरोध किया। और भविष्य में ऐसे हमलों पर रोक लगाने की बात की। सभी ने कहा कि कट्टरपंथी हिंदूवादी ताकतों के इस तरह के जुल्मोसितम को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। वक्ताओं ने कहा कि अगर हमारी मांग पूरी नहीं होती, इस तरह के हमले नहीं रुकते तो उग्र आंदोलन भी हो सकता है।
    
सभा के बीच में ही प्रशासन के अधिकारियों को मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन दिया गया। जिसमें मांगें थीं- बौद्ध धर्म गुरुओं को वापस बुद्ध विहार सम्मान के साथ भेजा जाए, इस घटना में शामिल विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोगों और साथ में गए पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही की जाए, सम्राट अशोक बुद्ध पर्यटन स्थल को मुक्त कराया जाए। ज्ञापन के बाद भी सभा चलती रही। लोगों में इन फासीवादी हमलों के खिलाफ आक्रोश देखने लायक था। सभा में कहा गया कि अगर 20 दिसंबर तक हमारी मांगें नहीं मानी गईं। तो भंते लोग और सहयोगी संगठन मिलकर 21 दिसंबर 2024 को धरना स्थल पर इकट्ठा होकर बुद्ध विहार और पर्यटन स्थल की ओर प्रस्थान करेंगे। और अपनी भूमि को हिंदूवादी संगठनों से मुक्त कराएंगे।
    
इस दौरान हिंदूवादी संगठन भी इस मसले पर सक्रिय रहे। इन संगठनों ने मंझिया के निवासियों जो कि मुख्यतः जाता समाज के हैं और भंते लोग जो मुख्यतः मौर्य समाज के हैं, इनके बीच जातीय अंतर्विरोध को भड़काने की कोशिश की। इसमें एक हद तक संघी संगठन सफल भी हुए। हिंदूवादी संगठन भी बीच-बीच में भंते और मौर्य शाक्य महासभा के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे। इन लोगों ने भी अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन दिए। हिंदूवादी नेताओं के बीच-बीच में भड़काऊ बयान चलते रहे। उन्होंने भी कहा कि अपने धार्मिक स्थल को कब्जा मुक्त कराने के लिए वे आंदोलन करेंगे। इस काम में उन्होंने जातीय अंतर्विरोध का भरपूर फायदा उठाया।
    
संघी संगठनों ने इस जगह को शिव मंदिर बताकर हमला किया था। उनके अनुसार भंते लोगों ने उस पर कब्जा किया हुआ है। जबकि सपा सरकार में इस जगह को सम्राट अशोक बुद्ध पर्यटन स्थल घोषित किया जा चुका था। इसके विकास के लिए सरकार और तत्कालीन सांसद ने लगभग एक करोड़ की राशि भी दी थी। इसके बाद पर्यटन स्थल का सीमांकन किया गया। चारों ओर बाउंड्री बाल बनाई गई। इसमें एक तालाब भी है जिसका नाम सूरजकुंड है। जो काफी पुराना है। इसकी भी मरम्मत कराई गई। हिंदू संगठनों के अनुसार इस तालाब में मूर्तियां दबा दी गईं। इसमें बुद्ध और अंबेडकर की मूर्तियां हैं। भंते लोगों की उपासना के लिए एक हाल है, और उनके रहने की व्यवस्था है। भंते लोग और मंझिया के निवासियों के बीच संबंध भी अच्छे नहीं रहे हैं। इसका फायदा भी हिंदूवादी संगठनों को मिला।
    
बौद्ध धर्म गुरुओं और जनता के लंबे चले धरने के बाद 20 दिसंबर को जिला प्रशासन ने बुद्धिस्टों के एक प्रतिनिधिमंडल को जिला अधिकारी महोदय ने अपने आवास पर बुलाया। धरने पर बैठे बुद्धिस्टों की मांगों के समाधान को लेकर लंबी वार्ता चली। वार्ता उपरांत बौद्ध भिक्षुओं को बुद्ध विहार में पुनः स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद बौद्ध भिक्षुओं ने सम्राट अशोक बुद्ध पर्यटक स्थल मझिया स्थित बुद्ध विहार में प्रवेश किया। इस काम में पुलिस प्रशासन और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता साथ में रहे। 
    
उक्त लंबे संघर्ष में बौद्ध भिक्षुओं और सामाजिक संगठनों का प्रमुख रूप से योगदान रहा। अभी भी स्थिति को सामान्य नहीं कहा जा सकता। हिंदूवादी संगठन इस फिराक में हैं कि मामले को पुनः गरमाया जाए। भंते लोगों के पहुंचने के बाद भी हिंदूवादी लोग वहां पूजा अर्चना करने जा रहे हैं। देखना है ऊंट किस करवट बैठे। जनता भी सचेत हो रही है।        -बदायूं संवाददाता

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