अमरीकी और चीनी प्रतिद्वन्द्विता तीव्र होने की ओर

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अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को अपना प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं। वे इसके लिए दुनिया भर में व्यूह रचना कर रहे हैं। चीन की बढ़ती आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक ताकत ने पुराने वैश्विक समीकरणों में खलबली मचा दी है। अभी हाल ही में सिंगापुर में शांगरी-ला संवाद का आयोजन हुआ था। शांगरी-ला संवाद का आयोजन लंदन की एक संस्था इण्टरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज (आई आई एस एस) कराती है। यह संस्था कारपोरेट घरानों से वित्तपोषित है। इस संवाद का मकसद एशियाई देशों पर पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के स्वार्थों को साधने के लिए इस क्षेत्र के देशों के शासकों, नीति निर्माताओं और जनमत तैयार करने चले लोगों को प्रभावित करना होता है। 
    
इस संवाद में अमरीकी रक्षा सचिव पीटर हेगसेथ ने अपना चीन विरोधी अपना वक्तव्य दिया। हेगसेथ के आवाज की मुख्य बात यह थी कि एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए चीन की आक्रामकता से बहुत बड़ा खतरा है। उनके अनुसार, इस क्षेत्र में शांति बनाये रखने के लिए इस क्षेत्र के देशों को चीन के विरुद्ध एक संयुक्त और शक्तिशाली कदम उठाना चाहिए। कि इस क्षेत्र के देशों को अमरीकी हथियार और गोलाबारूद से अपनी सेनाओं को मजबूत करना चाहिए। उन्हें चीन के साथ व्यापार को खत्म करके अमरीका के साथ व्यापार करना चाहिए। वे इस बात को कहना नहीं भूले कि चीन ताइवान को ताकत के बल पर मिला लेना चाहता है। वे दक्षिण कोरिया, ताइवान और फिलीपींस की तर्ज पर समूचे पूर्वी, दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में प्रकारान्तर से अपनी फौज की मौजूदगी होने की वकालत कर रहे थे।
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रतिनिधि हेगसेथ यह अच्छी तरह जानते हैं कि चीन इस क्षेत्र के देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वे व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में चीन को पीछे नहीं कर सकते। ऐसी हालत में वे सैनिक तौर-तरीकों के इस्तेमाल के लिए इस क्षेत्र के देशों की गोलबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं। 
    
इसी संवाद में हेगसेथ ने शेखी बघारते हुए कहा कि अमरीका ने चीनी कम्पनियों को पनामा नहर से खदेड़ दिया है। पनामा नहर का मालिकाना 1999 में पनामा सरकार को मिल गया था। इसी पनामा नहर के बंदरगाह पर से चीनी बंदरगाह कम्पनियां काम करती थीं। ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद चीनी कम्पनियों के वहां काम करने में रोक लगा दी। 
    
शांगरी-ला संवाद के दौरान अमरीकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र के देशों के लिए चीनी खतरे का बार-बार जिक्र करके अपनी मोर्चाबंदी करने में लगे हुए थे। इस क्षेत्र के शासक उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बाद लम्बे समय तक अमरीकी साम्राज्यवाद के अधीन रह चुके हैं। वे चीन के खतरे से भी डरे हुए हैं लेकिन उसके स्थान पर वे अमरीका की छत्रछाया में रहने के खतरे से भी अवगत हैं। वे दोनों साम्राज्यवादी शक्तियों से लाभ लेना चाहते हैं लेकिन किसी के अधीन जाने को तैयार नहीं हैं। इसलिए हेगसेथ की इन चेतावनियों का वहां के शासकों के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। 
    
इसी समय के आस-पास मलेशिया में आसियान के देशों और जी सी सी (खाड़ी सहयोग परिषद) के देशों की चीन के साथ एक बैठक हुई। इस बैठक में आसियान के 10 देश खाड़ी सहयोग परिषद के 6 देश और चीन की इस बैठक में परस्पर व्यापारिक सहयोग को बढ़ाने, अवरचना क्षेत्र को और ज्यादा विकसित करने में सहयोग करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित उच्च तकनीक क्षेत्र में सहयोग करने पर सहमति बनी। 
    
आसियान देश संयुक्त रूप से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बन चुके हैं। खाड़ी सहयोग परिषद के देश दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस भण्डार के मालिक हैं। खाड़ी देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी दुनिया की औसत जीडीपी से तीन गुना है। इस प्रकार, चीनी साम्राज्यवादियों की निगाह आसियान और जी सी सी देशों पर लम्बे समय से रही है। ये दोनों क्षेत्र चीन की बेल्ट और रोड इनीशियेटिव के भागीदार रहे हैं।
    
अमरीकी साम्राज्यवादी चीन के इस बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए हर तरह की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध का विस्तार चीनी और रूसी साम्राज्यवादियों के प्रभाव को कमजोर करने का एक बड़ा कारण रहा है। 
    
हालिया इजरायल-अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के वक्त चीनी साम्राज्यवादी खुलकर अमेरिका के विरोध में खड़े हो गये। उनके प्रवक्ता ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका की बमबारी के शिकार देशों की वर्षवार सूची जारी करते हुए कहा कि विश्व शांति के लिए कौन बड़ा खतरा है, इसे सब जानते हैं। 
    
इस संघर्ष में चीनी साम्राज्यवादियों का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है और अमरीकी साम्राज्यवादी अभी सबसे ताकतवर होने के बावजूद कमजोर होने की ओर जा रहे हैं।
    
ऐसा लगता है कि यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहने वाली है। 

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