सीढ़ी -सुकान्त भट्टाचार्य

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
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हम सीढ़ियां हैं -
तुम हमें पैरों तले रौंदकर
हर रोज बहुत ऊपर उठ जाते हो
फिर मुड़कर भी नहीं देखते पीछे की ओर
तुम्हारी चरणधूलि से धन्य हमारी छातियां
पैर की ठोकरों से क्षत-विक्षत हो जाती हैं- रोज ही।

तुम भी यह जानते हो
तभी कालीन में लपेट कर रखना चाहते हो
हमारे सीने के घाव
छुपाना चाहते हो अपने अत्याचारों के निशान
और दबाकर रखना चाहते हो धरती के सम्मुख
अपनी गर्वोद्धत अत्याचारी पदचाप !

फिर भी हम जानते हैं
दुनिया से हमेशा छुपे न रह सकेंगे
हमारी देह पर तुम्हारे पैरों की ठोकरों के निशान
और सम्राट हुमायूं की तरह
एक दिन
तुम्हारे भी पैर फिसल सकते हैं !
साभार : कविता कोश
 

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