ब्रिक्स सम्मेलन और ट्रम्प

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बीते दिनों 6-7 जुलाई को ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में ब्रिक्स का 17वां वार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ। रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में बने इस संगठन के सम्मेलन में दोनों देशों के राष्ट्रपति मौजूद नहीं थे। ब्रिक्स की शुरूआत ब्राजील, रूस, चीन, भारत के समूह के रूप में हुयी थी बाद में इसमें द.अफ्रीका भी शामिल हो गया था। पिछले कुछ वर्षों में इसमें कई नये देश शामिल हुए हैं। 
    
अमेरिकी वर्चस्व को कम करने को केन्द्रित इस संगठन से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जब तब आपत्ति जताते रहे हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के वक्त भी उन्होंने इसे अमेरिका विरोधी पर अप्रभावी संगठन करार दिया। इसके साथ ही ब्रिक्स देशों पर डालर के वर्चस्व को चुनौती देने का आरोप लगाते हुए 10 प्रतिशत टैरिफ ब्रिक्स देशों पर थोपने की धमकी दे डाली। 
    
इस वर्ष ब्रिक्स सम्मेलन का एजेण्डा ‘‘अधिक समावेशी और टिकाऊ शासन के लिए वैश्विक दक्षिण सहयोग को मजबूत करना’’ था। ब्रिक्स में ईरान, इण्डोनेशिया शामिल हो चुके हैं और तमाम अन्य देश ब्रिक्स भागीदार देशों के रूप में शामिल हुए।     
    
सम्मेलन के बाद जारी घोषणा पत्र दिखाता है कि कुछ मामलों पर इसके भागीदार देश एकमत हैं तो कुछ मामलों में इनके तीखे टकराव हैं। अमेरिकी वर्चस्व को कम कर बहुध्रुवीय दुनिया के मसले पर, सुरक्षा परिषद के विस्तार, आई एम एफ-विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक में एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका की भागीदारी बढ़ाने, विभिन्न मसलों पर पारस्परिक सहयोग पर ये देश एकमत हैं। 
    
पर भारत-चीन टकराव के चलते भारतीय शासक ब्रिक्स के मंच पर एक प्रस्ताव लेते हैं पर दूसरे मंचों पर विपरीत बातें करते नजर आते हैं। ब्रिक्स घोषणा पत्र ईरान पर अमेरिकी इजरायली हमले की निन्दा करता है, गाजा में इजरायली नरसंहार की निंदा करता है पर भारतीय शासक इजरायल से सम्बन्ध प्रगाढ़ करने में लगे रहते हैं। इसी तरह अमेरिकी वर्चस्व का ब्रिक्स में विरोध पर ये दस्तखत करते हैं पर अन्यथा ये चीन के खिलाफ अमेरिकी अभियान के भागीदार बन जाते हैं। डालर के खिलाफ भारतीय शासक स्थानीय मुद्रा में तो व्यापार को तैयार होते हैं पर ब्रिक्स की साझी मुद्रा के लिए ये तैयार नहीं हैं। 
    
दरअसल भारतीय शासक चीनी साम्राज्यवादियों की तुलना में अमेरिकी साम्राज्यवाद को अपना अधिक करीबी मानते हैं। वे अमेरिका से रिश्ते बनाते हुए रूसी साम्राज्यवादियों से भी मित्रता बनाये रखना चाहते हैं। उनकी ये स्थिति दो ध्रुवों में बंटती दुनिया में किसी पाले में न खड़े होने की ओर ले जाती है। 
    
ब्रिक्स संगठन ने जो मंसूबे अपनी स्थापना के वक्त जाहिर किये थे उस दिशा में यह धीमी गति से ही सही आगे बढ़ रहा है। चीनी साम्राज्यवादियों का उभार इस संगठन की ताकत है और चीनी साम्राज्यवादियों की भविष्य की गति ही ब्रिक्स के भविष्य को तय करेगी।
    
ट्रम्प की धमकियां ब्रिक्स देशों के लिए दिक्कत तो पैदा कर रही हैं पर ये किसी मायने में ब्रिक्स देशों को और करीब आने की ओर भी ले जा रही हैं।
    
अगले वर्ष तक के लिए भारत इस संगठन की अध्यक्षता करेगा। ऐसे में देखना यह होगा कि ट्रम्प के ‘मित्र मोदी’ इस संगठन के जरिये ट्रम्प के विरोध में, अमेरिका के विरोध में कुछ बातें करते हैं या चुप्पी साध कर ट्रम्प और ब्रिक्स दोनों को साधने की कोशिश करते हैं। मोदी सरकार की विदेश नीति के दिवालियेपन की चर्चा सारी दुनिया में है और अखण्ड भारत की बात करने वाले संघी सारे पड़ोसियों से रिश्ते बिगाड़ चुके हैं। 

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।