सेंचुरी पल्प एंड पेपर के मजदूर ‘नेताओं’ के नाम एक खुला खत
सेंचुरी पल्प एंड पेपर मिल के कारखाने में एक संविदा श्रमिक था - मोहन राम।
वो उसी मिल में काम करता था, जहां ये छः मजदूर संगठनों के पदाधिकारी ‘मजदूरों के नेता’ बनकर बैठते हैं। उसी कारखाने की धूल उसके फेफड़ों में भी थी, उसी कारखाने की थकान उसकी हड्डियों में भी थी।
मोहन राम अब नहीं रहे। पीछे छूट गई एक जवान पत्नी, एक छोटी सी मासूम बच्ची, और एक विधवा मां- जिसने बेटे की लाश देखी। न खेती के लिए जमीन, न रहने के लिए पक्का मकान। बस एक उम्मीद थी कि कोई तो आएगा, कोई तो दो शब्द कहेगा, कोई तो कंधे पर हाथ रखेगा।
वो घर सिर्फ 5 किलोमीटर दूर था। 5 किलोमीटर। न पहाड़ था, न नदी थी, न जंगल था। बस एक साधारण रास्ता था- जो एक मृत मजदूर के टूटे हुए परिवार तक जाता था। लेकिन ये छः संगठनों के नेता नहीं गए।
अब जरा पीछे मुड़कर देखते हैं- कुछ ही समय पहले ये वही पदाधिकारी थे जो प्रबंधन के खर्चे पर गुजरात की 7 दिवसीय यात्रा पर गए थे। सोमनाथ के दर्शन किए, द्वारकाधीश के सामने हाथ जोड़े, स्टेच्यू आॅफ यूनिटी के सामने तस्वीरें खिंचवाईं। प्रीमियम एसी बस, हाई-क्लास ट्रेन, उच्च स्तरीय होटल- सब कुछ उस प्रबंधन के पैसे से, जिसके सामने इन्हें मजदूरों की आवाज बनकर खड़ा होना चाहिए था।
हजारों किलोमीटर की यात्रा हो गई- प्रबंधन की कृपा से। पांच किलोमीटर की यात्रा न हुई- एक मृत मजदूर के लिए। यही है इन नेताओं का असली चरित्र।
यहां एक बात जो इन नेताओं के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा है- जो काम इन मजदूर नेताओं को सबसे पहले करना चाहिए था, वो काम स्थानीय लोगों के दबाव में प्रबंधन ने मजबूरन किया।
मोहन राम के परिवार को 9 लाख रुपए की सहायता दी गई। उनकी पत्नी को स्थायी नौकरी दी गई- ताकि वो विधवा अपनी बच्ची को पाल सके, अपनी सास को सहारा दे सके।
सोचिए- जिस प्रबंधन से लड़ने का दावा ये नेता करते हैं, उसी प्रबंधन को स्थानीय जनता के दबाव में एक मृत मजदूर के परिवार के लिए करना पड़ा। और जो नेता मजदूरों के ‘हमदर्द’ बनकर बैठे हैं- वो पांच किलोमीटर भी नहीं चले।
अब खुद सोचिए- असली इंसान कौन निकला?
और एक बात मन में यह भी आती है कि अगर इन नेताओं का बस चलता- तो क्या ये मोहन राम की मौत को भी सौदे का जरिया नहीं बना लेते? क्या ये प्रबंधन के सामने उस लाश की कीमत लगाकर अपनी जेब नहीं भरते? जिस तरह इन्होंने त्रिवार्षिक समझौते बेचे हैं, जिस तरह मजदूरों की मांगें गिरवी रखी हैं- उस चरित्र को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है।
ये धंधा है- आंदोलन नहीं। स्थायी हो या संविदा- इन नेताओं के लिए हर मजदूर सिर्फ एक मोहरा है। बिना चुनाव के संगठन चलाते हैं- क्योंकि चुनाव हुआ तो जनता जवाब मांगेगी। झूठे वादे करते हैं- क्योंकि वादे निभाने की नीयत कभी थी ही नहीं।
त्रिवार्षिक समझौते बेचते हैं- क्योंकि प्रबंधन की मेहरबानी से ही इनका घर चलता है।
नवंबर 2024 के समझौते को याद कीजिए- जब इन्होंने अपने बच्चों की कसमें खाईं कि बिना मजदूरों की सहमति के हस्ताक्षर नहीं करेंगे और फिर कर दिए। वर्कलोड पाॅलिसी पर आज तक कोई बात नहीं बनी- क्योंकि जब नेता गुजरात में मौज कर रहे थे, तब आपकी पीठ पर बोझ बढ़ता रहा। बच्चों की कसम तोड़ने वाले- मोहन राम के घर क्या जाते।
मजदूर भाइयों, यह भड़ास सिर्फ भड़ास नहीं है। यह एक आईना है। जब अगली बार कोई नेता आपके सामने मंच पर आए- मुट्ठी तानकर ‘इंकलाब’ बोले, आंखों में आंसू लाकर ‘मजदूर की मां’ का नाम ले- तो मोहन राम की उस छोटी बच्ची को याद कर लेना- जिसके बाप की मौत पर ये नेता पांच किलोमीटर भी नहीं चले।
याद रखना कि इन्होंने धर्म के नाम पर हजारों किलोमीटर की यात्रा की- प्रबंधन के पैसे पर।
याद रखना कि मजदूर की विधवा को न्याय दिलाने का काम भी स्थानीय जनता ने किया- इन नेताओं ने नहीं।
अंत में- मोहन राम जी- आपको जो सम्मान मिलना चाहिए था, वो इन नेताओं ने नहीं दिया। लेकिन आपके साथी मजदूर जानते हैं। वो देख रहे हैं। वो महसूस कर रहे हैं।
आपकी पत्नी आज कारखाने में काम पर जाएगी- अपनी बच्ची का पेट पालने के लिए। आपकी मां शायद आज भी दरवाजे की तरफ देखती होगी। और ये नेता- अगली यात्रा की तैयारी में होंगे।
मजदूर का खून सफेद नहीं होता- चाहे नेताओं का जमीर हो गया हो। एक दिन यह मजदूर वर्ग इस गद्दारी का हिसाब जरूर मांगेगा।
-एक मजदूर की कलम से, सेंचुरी, लालकुंआ