नफरत, हिंसा और नस्लवाद

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हिटलर की आत्मा के भारत के भीतर यात्रा के 100 साल हो चुके हैं। एक ओर यह सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है तो दूसरी तरफ अब हर शहर की गलियों में ये मौजूद है। इनके प्रभाव में नफरत, हिंसा और हत्याओं का सिलसिला आम नागरिकों को अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है। पहले निशाने पर मुसलमान थे जो आज भी पहले नंबर पर हैं। मगर हिंदू राष्ट्रवाद की नफरत, हिंसा और आतंक की यह राजनीति मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों और महिलाओं से होते हुए पूर्वोत्तर भारत के लोगों को भी अपने चपेट में लेने लगी है।
    
देहरादून में पूर्वोत्तर के कई छात्र कालेज में पढ़ाई के लिए लंबे समय से आते रहे हैं। वैसे ही जैसे कश्मीर से भी पढ़ाई के लिए यहां छात्र आते रहे हैं। कश्मीरी छात्र जो मुसलमान हैं वह तो हिंदू फासीवादियों के निशाने पर 2013-14 से ही रहे हैं। मगर अब पूर्वोत्तर के छात्र भी इस नफरत और हिंसा को महसूस करने लगे हैं। 
    
देहरादून के सेलाकुई बाजार में जिज्ञासा यूनिवर्सिटी के डठ। फाइनल ईयर के छात्र एंजेल चकमा (24) पर कुछ युवकों ने उसके चेहरे और भाषा को लेकर नस्लीय टिप्पणियां कीं; विरोध करने पर उन्हें पीटा गया और चाकू से हमला किया गया। एंजेल को गंभीर हालत में ग्राफिक एरा अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां लगभग 17 दिन संघर्ष के बाद उनकी मौत हो गई। पुलिस ने इस मामले पर भी कार्यवाही में ढील की। जैसा कि आम तौर खुद पुलिस के आम कर्मी भी इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। यह एक वजह ही सकती है। कई जगह आलोचना होने, विरोध प्रदर्शन होने के बाद 6 अपराधियों की गिरफ्तारी कर ली गई है और एक अपराधी जो कि नेपाल भाग गया है उस पर पकड़वाने का इनाम घोषित किया गया है।
    
अब एक हत्या और हिंसा के बाद जैसा कि फैशन बन गया है वही नाटक देखने को मिल रहा है। भाजपाई मुख्यमंत्री धामी ने पीड़ित परिवार से फोन पर बात की। इसी तरह त्रिपुरा में अपने आधार को बचाने के लिए वहां के भाजपाई मुख्यमंत्री माणिक शाह ने प्रेस के जरिए बताया कि उन्होंने गृह मंत्री शाह और धामी से बात की है। इतनी मासूमियत वो लोग दिखा रहे हैं जिन्होंने समूचे देश में नफरत, उन्माद और हिंसा की राजनीति को परवान चढ़ाया है। 
    
इन 6 हत्यारों को ही असली अपराधी बताकर संघी भाजपाई अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर सब जानते हैं कि इस नस्लवाद, नफरत और हिंसा के तार किससे जुड़ते हैं। एक शताब्दी से जो लोग फर्जी इतिहास बताकर भारत में मुसलमानों को दुश्मन के बतौर चित्रित करते रहे हैं और इनके खिलाफ नफरत, हिंसा का तांडव करते रहे हैं उसका यह हश्र होना ही था कि नफरत भांति-भांति के फर्जी विभाजन खड़े करके हिंसा, उन्माद को आगे बढ़ाती। यह देश के कोने-कोने में पैठ करती। असल में यही तो संघी, भाजपाई और शासक वर्ग चाहता है। इस रूप में ये सफल भी हैं और बाहर भले ही कार्यवाही करने का नाटक कर रहे हैं अंदरखाने और मन ही मन इस बात का जश्न भी मना रहे हैं।
    
ये 6 युवक; जिन्होंने नस्लवाद और नफरत से ग्रसित होकर एंजेल चकमा पर हमला कर दिया इसके लिए प्रत्यक्ष तौर पर संघ और भाजपाई नेता जिम्मेदार हैं, इनकी हिंदू राष्ट्रवाद की फासीवादी राजनीति जिम्मेदार है, भले ही ये इनके संगठनों से नहीं जुड़े हुए हों। मगर आवारा, लंपट युवाओं के लिए यह राजनीति बेहद आकर्षक है। वे इसका इस्तेमाल भी करते हैं और शिकार भी होते हैं।
    
अन्य रूप में देखा जाय तो परोक्ष तौर पर इसके लिए कांग्रेस और अन्ततः भारतीय शासक पूंजीपति वर्ग भी जिम्मेदार है जिसने नरम हिंदुत्व की राजनीति को अपनाया और साथ ही उग्र हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को संरक्षण दिया और इसके लिए रास्ता तैयार किया।
    
असल में तो पूर्वोत्तर भारत से आजाद भारत के पूंजीवादी शासकों को शुरुवात से ही जो चुनौती मिली उसका नतीजा नस्लवाद के रूप में होना ही था। मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम अधिकांश यहां अपने आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए भारत सरकार से संघर्ष कर रहे थे। इन संघर्षों को अलगाव में धकेलने के लिए ही नस्लवाद को कांग्रेस सरकार ने तब खूब इस्तेमाल किया। नस्लवाद के रूप में नफरत 80 के दशक तक बढ़ती गई। हालांकि कई वजहों से संघर्ष कमजोर पड़कर लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच गया। मगर नस्लवाद बना रहा।
    
संघर्ष को खत्म करने की एक रणनीति थी आत्मसातीकरण। जिसमें राजनीतिक भागीदारी के अलावा दिल्ली से लेकर अन्य राज्यों में पूर्वोत्तर भारत के नौजवानों को उच्च शिक्षा हेतु अवसर दिए गए। मगर जिस नस्लवादी नफरत का इस्तेमाल किया गया वह आम जन के एक हिस्से में पैठ कर गई। इसका नतीजा नस्लवादी टिप्पणियों, भेदभाव और हमले आदि के रूप में होता था। यह नस्लवाद बीच में कमजोर पड़ा ही था कि हिंदू राष्ट्रवादियों के आने के बाद जब नफरत, उन्माद, हिंसा की आराधना होने लगी और यही आदर्श बताया जाने लगा तो नस्लवाद और अन्य पुराने विभाजनकारी नफरत वाले मुद्दे फिर से सतह पर आ जाने थे। यही इस वर्तमान हमले में भी दिखती है।
 

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