समूची शिक्षा को संघी बनाने की कवायद

/total-education-ko-snghi-banane-ki-kavaayad

2047 तक देश को विकसित बनाने की मोदी सरकार की नौटंकी जारी है। देश विकसित बने न बने पर देश के कानून जरूर विकसित भारत नाम के हो जायेंगे। इसी कड़ी में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक नया विधेयक ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक’ सरकार ने संसद में पेश किया है। फिलहाल इसे संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है। 
    
मोदी सरकार का दावा है कि इस विधेयक से देश को विकसित बनाने की ओर शिक्षा ले जायेगी। कि इससे 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का ढांचा बनाने में मदद मिलेगी। 
    
हकीकत एकदम उलट है। यह विधेयक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रस्तावों की कड़ी में एक कदम है। यह विधेयक कानून व मेडिकल क्षेत्र की शिक्षा को छोड़ समस्त उच्च शिक्षा को एक 14 सदस्यीय आयोग के मातहत लाता है। इस तरह यह आयोग विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (ए आई सी टी ई) व राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एन सी टी ई) के ऊपर एक वर्चस्वशाली उच्च शिक्षा आयोग को स्थापित करता है। यह आयोग समूचे देश में वि.वि.-कालेजों को मान्यता-अनुदान-एकरूपता के तौर पर नियंत्रित करेगा। 
    
स्पष्ट है कि यह विधेयक न केवल शिक्षा के क्षेत्र में राज्यों की स्वायत्तता को खत्म करता है बल्कि विश्वविद्यालयों की भी शैक्षिक स्वायत्तता को ध्वस्त कर उच्च शिक्षा आयोग का सब पर वर्चस्व स्थापित करता है। भारी केन्द्रीकरण से प्रेरित इस विधेयक से मोदी सरकार समूचे देश में संघी पाठ्यक्रम - संघी सोच- संघी संस्कृति उच्च शिक्षा के जरिये थोपना चाहती है। अगर कालेजों-वि.वि. को सरकार से बजट हासिल करना है तो उन्हें इस आयोग के इशारों पर नाचना पड़ेगा।     
    
केन्द्रीकरण की मंशा से लाये गये इस विधेयक के शीर्ष आयोग के सदस्यों की नियुक्ति में भी केन्द्र सरकार का वर्चस्व है और राज्यों की बेहद सीमित भूमिका है। साथ ही इस आयोग को अनुशासनहीनता व नियम पालन न करने पर विश्वविद्यालयों पर कठोर आर्थिक- प्रशासनिक दण्ड थोपने का प्रावधान है। आयोग विश्वविद्यालयों के अधिकारियों को हटाने, डिग्री देने की शक्ति छीनने, अनुदान रोकने व 2 करोड़ रुपये जुर्माना लगाने की शक्तियों से लैस बना दिया गया है। आयोग की किसी गलत कार्यवाही की शिकायत भी न्यायालय में नहीं बल्कि केन्द्र सरकार से ही की जा सकती है। 
    
स्पष्ट है कि संघ-भाजपा सरकार इस विधेयक के जरिये समूचे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों पर वर्चस्व कायम कर लेना चाहती है। इसका परिणाम समूची शिक्षा व्यवस्था के लिए काफी घातक होने वाला है। अभी तक विश्वविद्यालयों में संघी सोच के कुलपति-शिक्षक भेज सरकार शिक्षा पर नियंत्रण के प्रयास कर रही थी। अब सीधे ऊपर से नियंत्रण कायम किया जायेगा। 
    
मोदी सरकार अभी तक छात्रों-युवाओं के संघर्षों से कड़ी चुनौती पाती रही है। सरकार के हर काले कारनामे का छात्रों-युवाओं खासकर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के छात्रों ने डटकर मुकाबला किया है। ऐसे में सरकार इस विधेयक के जरिये छात्र राजनीति पर भी लगाम लगा उसे पालतू संघी लम्पट तैयार करने के अड्डे में बदलना चाहती है। 
    
घोर अवैज्ञानिक-अतार्किक सोच से लैस संघी शासकों के उच्च शिक्षा पर वर्चस्व का क्या परिणाम निकलेगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कला-साहित्य-संस्कृति ही नहीं विज्ञान भी अब संघी चश्मे से पढ़ाया जायेगा। तर्क करने के बजाय छात्र आस्थावान बनाये जायेंगे। कूपमण्डूकता का विरोध नहीं महिमामण्डन किया जायेगा। यहां से तैयार कूपमण्डूक-अतार्किक युवाओं की फौज देश को कैसे विकसित भारत की ओर ले जायेगी, इसको समझा जा सकता है। 
    
जरूरी है कि उच्च शिक्षा पर इस संघी हमले का विरोध किया जाये। देश के शिक्षण संस्थानों को नागपुर की संघी पाठशाला में बदलने के प्रयासों को रोका जाये। अन्यथा भविष्य में उच्च शिक्षा संघी लंपट बनाने का अड्डा बन जायेगी। 

आलेख

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।