इंदौर में दूषित पानी से मौतें

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:05
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इंदौर साफ-सफाई में सबसे स्वच्छ शहर का दर्ज़ा पाने वाला शहर है। सरकार करोड़ों रुपया फूंक इसे स्मार्ट सिटी बनाने पर उतारू है। लेकिन पिछले दिनों यहां दूषित पानी पीने से कई जानें चली गयीं। इसमें 5 माह का मासूम बच्चा भी है। इसके साथ ही सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती हैं। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में यह घटना घटित हुई। 
    
बताया जा रहा है कि पानी आपूर्ति की लाइन और सीवर की लाइन मिलने से दूषित पानी, पीने के पानी के साथ सप्लाई होने लगा। लोग लम्बे समय से पानी में गंध आने की शिकायत कर रहे थे। उन्होंने पार्षद से भी इस सम्बन्ध में शिकायत की थी। लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। जब लोगों की मौत दूषित पानी से होने लगी तब जाकर शासन-प्रशासन की नींद खुली। पानी की जांच करने पर उसमें वह सब बैक्टीरिया पाए गये जो मानव के मल-मूत्र में पाए जाते हैं। 
    
अब जाकर यह बात भी सामने आ रही है कि नगर निगम को इस बात की जानकारी थी कि भागीरथपुरा इलाके की पाइप लाइन पुरानी हो चुकी है और उसको बदलने के लिए पिछले साल अगस्त में टेंडर भी डाले जा चुके हैं। लेकिन उन टेंडर को न तो खोला गया और न ही मरम्मत का काम शुरू हुआ। सरकारी खींचतान में ही मामला लटकता रहा। परिणाम दूषित पानी से कई लोगों की मौत हो गयी।
    
इंदौर के विधायक कैलाश विजयवर्गीय हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार में नगर प्रशासन मंत्री का पद भी उनके पास है। जब एक पत्रकार ने इस मामले में उनसे सवाल पूछे तो वे बिफर गये और पत्रकार से कहने लगे कि फोकट का सवाल क्यों पूछते हो। इसके अलावा ‘‘घंटा’’ शब्द का भी अपशब्द के रूप में प्रयोग किया गया। पहले भी कैलाश विजयवर्गीय अभद्र भाषा का सरेआम प्रयोग करते रहे हैं।
    
आज भाजपा के मंत्री इतने निर्लज्ज हो चुके हैं कि लोगों की मौतों पर भी उन्हें कोई अफसोस नहीं होता है। वे इन सब मौतों को ऐसे लेते हैं मानो यह सब तो होना ही था, इन सबमें उनका कोई हाथ नहीं है। गौरतलब है कि दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में तो किसी अधिकारी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई पर जब इस मामले में विरोध प्रदर्शनों में कानून व्यवस्था बनाने के लिए एस डी एम आनंद मालवीय ने एक आदेश निकाला और गलती से उसमें कैलाश विजयवर्गीय के उक्त बयान की चर्चा कर दी तो एस डी एम को निलंबित कर दिया गया।
    
मोदी सरकार हर घर पेयजल पहुंचाने के लिए शहर ही नहीं गांवों में भी योजनायें चला रही है। ऐसे में मामला केवल इंदौर का ही नहीं है सभी बड़े शहर और अब गांव देहात भी इंदौर सरीखी त्रासदी के मुहाने पर खड़े हैं। दरअसल पेयजल की पाईप लाइन बिछाने वाले किसी जगह पर पहले सड़क खोदते हैं फिर सीवर लाईन वाले, बिजली के तार वाले फिर उस जगह हो खोदते हैं। इस प्रक्रिया में न तो इसका ध्यान दिया जाता है कि सीवर लाईन व पानी की लाईन में उचित दूरी हो और न ही इस पर ध्यान दिया जाता है कि इस बार-बार की खुदाई से दूसरी पाईप लाइनों को नुकसान तो नहीं पहुंचा है। जगह-जगह से पेयजल के सैम्पल ले उनकी गुणवत्ता जांचने का काम तो कागजी खानापूरी बन जाता है। इंदौर मामले में ही 2017-18 में शहर के 60 सैंपलों में 59 सैंपल फेल हो गये थे पर इसकी जांच करने व इंतजाम ठीक करने में सरकारी महकमा 8 वर्ष में भी कार्यवाही पूरी नहीं कर सका। ऊपर से पाईप लाइन डालने का ठेका व उसमें कमीशनखोरी लोगों की जान दांव पर लगाकर कमाई करने का तरीका है। भाजपा के शासन में जब फर्जी वेंटीलेटर अस्पतालों को सौंपे जा सकते हैं तो फिर पेयजल तो रामभरोसे ही पीने योग्य हो सकता है। 

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