मानेसर मजदूर आंदोलन के दौरान जेल का अनुभव

Published
Thu, 07/16/2026 - 10:50
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मानेसर (गुड़गांव) मजदूर आंदोलन का दमन करने के लिए पुलिस प्रशासन ने पहले मजदूरों को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर जेल भेजा। फिर 12 अप्रैल की रात को हमें (इंकलाबी मजदूर केन्द्र के कार्यकर्ताओं) उठाकर थाने ले गए। 13 अप्रैल को दिन भर हमें थाने में रखा और शाम को कोर्ट में पेश कर किया। कोर्ट ने हमें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भोंडसी जेल भेजा।
    
भोंडसी जेल, हरियाणा की एक प्रमुख और हाई-सिक्योरिटी जिला जेल है। जो शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर है। भोंडसी जेल के बाहर एक विशाल दरवाजा है। उसमें अंदर जाने के लिए एक छोटा दरवाजा है। हमें छोटे दरवाजे से अंदर भेजा गया और लाइन से खड़ा कर दिया। एक सिपाही को हमारी गिरफ्तारी के कागज दिए गये। सिपाही ने कागजों को देख अपनी कड़क आवाज और धमकाने के अंदाज में हमसे नाम, पिता का नाम और पता, किस जुर्म में जेल आए हो आदि पूछ कागज से मिलान किया। हमें मैटल स्कैनर से निकलने के लिए कहा। एक सिपाही ने हमारी तलाशी ली और दूसरे ने हमारे डिजिटल फिंगर प्रिंट्स लिए। सिपाहियों का व्यवहार इतना सख्त और रुखा था कि हमें इस बात का अंदाजा लग गया कि जेल में सिपाहियों से किसी तरह की नरमी की उम्मीद रखना बेकार हैं। 
    
हमें एक कमरे में ले गए जहां पर बायोमेट्रिक और डिजिटल एंट्री हो रही थी। उस दिन 20 से ज्यादा लोग जेल लाए गए थे। उन सभी की बायोमेट्रिक और डिजिटल एंट्री की जा रही थी। हमें भी एक-एक करके बुलाया गया। सामने से, साइड की तरफ से फोटो खींचे गए और दोनों हाथों के और आंखों की बायोमेट्रिक एंट्रियां कीं। हमारी लंबाई और वजन किया। फिर आधार कार्ड से आॅनलाइन एंट्री की गई साथ ही एक रजिस्टर में नाम, पिता-माता व पत्नी का नाम, फोन नंबर, घर का पता आदि रजिस्टर में दर्ज किया गया और अंगूठे के निशान लगवाए गये। इस काम में शाम के लगभग 8ः00 बज गए थे। 
    
वहां एक नंबरदार आया। जिसको झौकर कहकर पुकार रहे थे। जेल में ज्यादातर काम वह कैदी करते हैं जिन्हें सजा हो चुकी होती है। बैरकों की निगरानी व व्यवस्था के लिए जो कैदी होते हैं उन्हें नंबरदार कहते हैं। वह सभी को एंट्री गेट की तरफ ले गए। वहां एक और बड़ा सा दरवाजा था और उसमें अंदर जाने के लिए एक छोटा दरवाजा। हम सबको लाइन बनाकर अंदर बैरक नंबर 23 में ले गए। इस बैरक को मुलायजा कहा जाता है। यह एक तरह से जेल का ट्रेनिंग सेंटर था। बैरक में ले जाकर उसमें हमें जेल में रहने के खाने-पीने और सोने के ‘कायदे कानून’ बताए गये। उसने बताया कि यहां छोटी सी भी गलती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दो-तीन कैदियों से ‘कायदे कानून’ में थोड़ी सी चूक हुई तो उसने उनकी प्लास्टिक के पाइप से पिटाई की। इस तरह से झौकर (नंबरदार) ने अपना खौफ बनाया हुआ था।
    
बैरक में एक तरफ दो बड़े ड्रमों में दाल और सब्जी व एक थैले में रोटियां आई थीं। वहीं एक तरफ थालियां रखी हुई थीं। क्योंकि थालियां कम थीं इसलिए कहा गया कि एक थाली में दो लोग खाएंगे।
    
जेल का खाना इंसानों के खाने लायक बिल्कुल भी नहीं था। दाल और सब्जी कच्ची और पानी वाली थी और रोटियां कई जगह से कच्ची-पक्की और मोटी थीं। रोटियों में पर्तन (आटा) भी बहुत ज्यादा लगा हुआ था। क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था इसलिए हमारे समेत सभी कैदियों ने वही खाना खाया। 
    
सुबह हम लगभग 6 बजे उठ गए। 7 बजे के लगभग चाय और साथ में भोंडसी जेल के अंदर ही आटे के बने बंद (ब्रेड) आए। हमने चाय पी। फिर कुछ नौजवान लड़कों को छोड़ हम सभी को बैरक के बाहर मैदान में ले गए। यहां अच्छी हरियाली थी और छायादार पेड़ थे। मैदान में पेड़ों से गिरे हुए पत्ते बिखरे पड़े थे हमें उन पत्तों को उठाने के लिए कहा गया। उसके कुछ समय बाद तीन लड़के बाल काटने के लिए आए। नंबरदार ने बताया यहां नियम है कि सभी के बाल और दाढ़ी छोटे-छोटे होंगे। हम सभी के बाल घास की तरह काट दिए। फिर हमें दोबारा बैरक में भेज दिया।
    
लगभग 4 बजे के करीब एक बार फिर चाय आई। चाय पीने के बाद हमें फिर मैदान में ले गए और पेड़ों से गिरे हुए पत्ते चुनवाए। फिर लगभग सात-आठ बजे के करीब हमें खाना दिया जो आ चुका था यही प्रक्रिया दो दिन चली। 
    
इस बीच सभी को UT (अंडर ट्रायल) नंबर दिया गया। एक तरह से यह आनलाइन अकाउंट था। हमें बताया गया कि इसमें आनलाइन पैसे मंगवाकर हम अपनी जरूरत का सामान ले सकते हैं और बात करने के लिए जो एसटीडी फोन है उसके लिए भी पैसे डलवाने पड़ेंगे। 
    
इसी बीच पहली बार हमारी परिवार वालों से मुलाकात हुई। मुलाकात के लिए हमें एक कमरे में ले जाया गया जहां एक तरफ 20 फोन के रिसीवर रखे हुए थे बीच में सलाखें और कांच की एक दीवार थी जिसकी दूसरी तरफ भी रिसीवर रखे हुए थे। मुलाकात के लिए अपने परिवार वालों के सामने रखे रिसीवर को उठाकर बात कर सकते थे। इतने दिनों बाद परिवार वालों से मुलाकात हुई और वह भी इस तरह से कि हम सही से एक-दूसरे का हाल-चाल भी नहीं ले सकते थे।
    
तीसरे दिन शाम के समय हमें यह बताया गया कि हमें दूसरे अंडर ट्रायल कैदियों के साथ में कौन सी बैरक में रखा जाएगा जिसे उनकी भाषा में गिनती काटना कहते हैं। 
    
जेल के नियम के अनुसार कैदियों को उनके नाम के पहले अक्षर यानी अल्फाबेट के हिसाब से अलग-अलग बैरकों में भेजा जाता है। हमारे नामों के हिसाब से हम तीन साथियों को एक जगह और तीन साथियों को अलग-अलग बैरकों में भेजा गया।
हम सभी को फेस 1 में भेजा गया। यहां हत्या, हत्या के प्रयास और नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए अंडर ट्रायल कैदियों को रखा गया था। हम तीन साथियों को बैरक नंबर 9 के B ब्लाॅक में भेजा गया। 
    
इस बैरक में 100 से ज्यादा अंडर ट्रायल कैदी थे। उसमें से कुछ बैरक में टहल रहे थे और कुछ खाना बना रहे थे। हमें कुछ लोगों ने घेर लिया और हमें अपने साथ अन्दर ले गए। 
    
यह बात हमारे लिए चैंकाने वाली थी। तीन चार लोगों के ग्रुप ने शुरूवाती पहचान के रूप में हमसे बात की कि हम कहां के रहने वाले हैं, क्या काम करते हैं, किस मामले में जेल में आए हैं आदि आदि। उन्होंने हमें बैरक के ‘कायदे कानून’ बताए कि क्योंकि खाना खाने लायक नहीं होता। इसलिए हम उसे खाने लायक बनाने के लिए भट्टी जलाकर उसमें तड़का लगाते हैं या कुछ और बनाते हैं। रोटियों को खाने लायक बनाने के लिए उसे झाड़ कर उसे दोबारा गरम करते हैं तो तुम्हें भट्टी जलाने, तड़का लगाने और रोटियां सेंकने का काम करना होगा। एक से कहा कि आपकी उम्र ज्यादा है इसलिए आप काम न कर, जो खर्चा आता है उसके लिए 2500 रु. से 3000 रु. कंट्रीब्यूशन कर देना। एक साथी को एक दूसरा ग्रुप ले गया और उससे कहा कि तुम्हें खाना बनाने, लोगों को खाना खिलाने और बर्तन धोने का काम करना होगा। क्योंकि हमें यहां के ‘कायदे कानून’ नहीं पता थे, तो हम फिलहाल यह काम करने के लिए तैयार हो गए। 
    
हमारी बैरक में लगभग 65 के करीब लोग रहते थे। कभी कोई नया कैदी आता, तो कभी कोई जमानत में बाहर चला जाता। उन्होंने अपने क्षेत्र, जाति व अन्य हिसाब से 7 से 8 ग्रुप बनाए हुए थे। हर ग्रुप में 7, 8 से 10 तक लोग होते थे। बैरक में रोज का नियम था कि सुबह लगभग 7 बजे सिपाही एक नंबरदार के साथ आता और दरवाजा खोल कर कैदियों की गिनती करता। फिर लोग अपने रोजमर्रा के काम में लग जाते जिनका काम भट्टी जलाकर चाय व खाना बनाने का था वह अपने काम में लग जाते थे। बाकी टहलने लगते और कुछ दोबारा जाकर सो जाते। कुछ ही समय में चाय आती पर क्योंकि चाय बहुत ही खराब थी इसलिए एक दो व्यक्तियों को छोड़कर कोई चाय नहीं लेता था। चाय के लिए जेल प्रशासन की तरफ से हर कैदी को जो ढाई सौ ग्राम दूध मिलता था उसकी चाय बनाते थे। लगभग 7ः30 बजे जेल प्रशासन की तरफ से दिया जाने वाला खाना दाल और सब्जी आता था। काम करने वाले जगों में दाल लेते थे। क्योंकि सब्जी बहुत ही खराब व कच्ची होती थी इसलिए ज्यादातर लोग दाल ही लेते थे। तड़के के लिए प्याज, हरी मिर्च और टमाटर जो कैंटीन से मिलता था उसे काट कर तड़का लगाते थे। दोपहर 12 बजे नंबरदार सभी कैदियों को बैरक में अंदर भेज कर ताला लगा देता। लोग अपने समय अनुसार खाना खा लेते थे।
    
शाम 4 बजे एक बार फिर बैरक को खोल दिया जाता था। चाय और खाना आता और फिर सुबह वाली प्रक्रिया ही दोहराई जाती। शाम 6 बजे सिपाही नंबरदार के साथ आता और गिनती कर कैदियों को बैरक में बंद कर देता ताकि कोई कैदी बाहर न रह जाए। इस पूरी प्रक्रिया पर एक कैदी ने जो लगभग 42 महीनों से (कैदी जेल में रहने के समय को महीनों में बताते थे) बंद थे उन्होंने कहा कि जैसे गडरिया अपनी भेड़ों को सुबह चराने के लिए खोल देता है और शाम को उन्हें गिनती करके, कि कहीं कोई भेड़ बाहर तो नहीं रह गई, फिर दोबारा से उन्हें बंद कर देता है उसी तरीके से यहां भी होता है कि सुबह सिपाही आता है गिनती कर सबको गिनता है और शाम को गिनती कर अंदर बंद कर देता है। 
    
इसी तरह से दिन कटते चले गए और हमें जेल के कई ‘कायदे कानून’ पता चलते गए। जेल को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए जेल प्रशासन के कुछ ही सिपाही या कर्मचारी होते हैं जो सुरक्षा व्यवस्था देखते हैं, बाकी इसके अलावा जेल की पूरी व्यवस्था जेल में सजा पा चुके कैदियों से ही करवाई जाती थी। 
    
जेल में लिखत-पढ़त व कागजी कार्रवाई, कैदियों को पेशी में भेजना, जेल में खाना बनाने से लेकर बैरकों में खाना भेजने तक, पूरे जेल में बागवानी से लेकर साफ-सफाई की व्यवस्था, कैदियों के बाल व दाढ़ी काटना, बिजली आदि सभी काम सजा पाए कैदियों से ही कराया जाता था।  
    
बैरक को व्यवस्थित तरीके से चलाने और कैदियों की निगरानी रखने का काम सजा पाए कैदी करते हैं जिन्हें नंबरदार कहा जाता है। हर बैरक में दो नंबरदार कैदियों के साथ ही रहते हैं।
    
फेस वन में कुल 9 बैरकें थीं। हर बैरेक में दो ब्लाॅक थे। एक भंडारा जहां पर खाना बनता था और एक कैंटीन थी जहां से कैदी अपनी जरूरत का सामान खरीदते थे। बैरकों के बीच में एक बड़ा हरा-भरा खुला मैदान था। 5 से 7 सिपाही बैठते थे जिसे चक्कर कहा जाता था। चक्कर की दहशत कैदियों के अंदर बिठाई गई थी।
    
यदि बैरक में कोई कैदी आपस में झगड़ते या लड़ाई करते थे तो नंबरदार यह बात चक्कर में जाकर हवलदार को बताता था और फिर झगड़ा करने वाले कैदियों को चक्कर में बुलाया जाता था। वहां पर उनकी पट्टे (जो रबड़ का बेंत जैसा होता था) से पिटाई की जाती थी।
    
बैरक के अंदर की पूरी साफ-सफाई की जिम्मेदारी एक कैदी को दी हुई थी जिसे मेट कहते थे। इसके लिए उसे प्रत्येक कैदी से 100 रु. देना तय किया गया था। वह दिन में दो बार सुबह और शाम बैरक में झाड़ू लगाता था और रविवार के दिन पोंछा लगाता और लैट्रिंन साफ करता था। इसके अलावा उसकी जिम्मेदारी भंडारा से सुबह के समय दूध और बंद और सुबह और शाम को रोटी लाने की थी। इतनी मेहनत करने के बावजूद उसे कोई सम्मान नहीं मिलता था। उससे सही से बात भी नहीं करते थे। कैदी यहां-वहां कूड़ा फैलाते थे। पर फिर भी इस काम से उसे लगभग 6000 से 6500 रुपए मिल जाते थे। वह इसमें से कुछ पैसा अपने खर्चे के लिए रखकर बाकी पैसा अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए भेज देता था। 
    
जेल में यह देखने में आया कि जिस तरह से बाहर दो बड़े वर्ग हैं एक पूंजीपति है, जिसके पास पूंजी फैक्टरी-कारखाने हैं और दूसरा जिनके पास कुछ नहीं है और उसे पूंजीपति के यहां काम करना पड़ता है ताकि वह अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके। इसी तरह से जेल में भी साफ-साफ दो तरह के विभाजन देखने को मिले। एक जिन के पास पैसा था वह खाने-पीने में पैसा खर्च करते थे और दूसरे मेहनत करने वाले, जिन्हें इन पैसे वालों के यहां काम करना पड़ता था। काम करने वाले लोग ज्यादातर मजदूर-मेहनतकश पृष्ठभूमि के थे। वह सारा काम करते थे। उन्हें कोई सम्मान नहीं मिलता था उल्टा उन्हें ही डांट, गाली देना और धमकाया जाता था। ज्यादातर काम करने वाले अपने ग्रुप में परेशान रहते थे। काम करने वाले लोगों की आपस में एक हद तक एकजुटता होती थी। काम करने के बाद ज्यादातर एक साथ बैठकर बातचीत करते थे। यदि किसी के यहां अच्छा खाना जैसे पनीर, कढ़ी आदि बनता था तो वह दूसरे को दे देता। कई बार तो काम करने वाले अन्य लोगों से विरोध भी कर देते थे। कभी-कभी यह भी देखने में आया कि वह काम करने से मना कर देते थे या काम छोड़ देते थे और एक-दो दिन बाद किसी दूसरे ग्रुप में काम करते। वैसे तो जेल किसी के लिए भी बेहतर नहीं है पर मजदूर-मेहनतकशों के लिए तो जेल उत्पीड़नकारी  जगह है। यहां उनके साथ वैसा ही व्यवहार होता है जैसा फैक्टरी में मजदूरों के साथ होता है। 
    
वैसे हमारी स्थिति कुछ बेहतर इसलिए रही कि जब बातचीत में हमने बताया कि आईएमटी मानेसर में न्यूनतम वेतन 11,000 रु. को बढ़ाने के लिए मजदूरों ने आंदोलन किया था क्योंकि इस महंगाई में मजदूर का जीवन दुश्वार हो चुका था जिसे बेहतर करने के लिए मजदूरों ने आंदोलन किया और हमें मजदूर आन्दोलन में शामिल होने व उनका समर्थन करने की वजह से जेल में डाला गया है तो ज्यादातर लोग कहते कि आपके केस में कोई दम नहीं है और आप लोगों को जल्द ही जमानत मिल जाएगी। मजदूर आंदोलन की वजह से जेल में आने के कारण कई कैदियों की हमारे प्रति सहानुभूति थी। उनकी हमारे बारे में एक बेहतर राय थी और वह हमसे बातचीत करते।
    
कैदी जेल प्रशासन से खाने की शिकायत न करें या उनके खिलाफ किसी तरह का विरोध न हो इसके लिए कैंटीन की व्यवस्था की गई थी। कैंटीन से खाने को बेहतर बनाने के तेल, मसाले, प्याज, टमाटर, मिर्च, लहसुन आदि आदि चीज ले सकते थे और भट्टी के लिए कोयले का भी इंतजाम था। पर कैंटीन में सिर्फ इतना ही नहीं था। कैंटीन में खाने-पीने की सभी सुविधाएं मौजूद थीं यानी दूध, छाछ व जूस से लेकर काजू-बादाम तक आप सभी चीज खरीद सकते थे। साथ ही साबुन, तेल, शेम्पू के साथ-साथ सैंट तक मौजूद था। बीड़ी-माचिस के अलावा सिगरेट भी खरीद सकते थे। बस शर्त यह थी कि आपकी जेब में कितना पैसा है। कैंटीन से सामान खरीदने के लिए जो UT नंबर बनाया और उसमें एसटीडी से फोन करने के लिए जिस परिवार वाले का फोन नंबर जुड़ता था वही आनलाइन के द्वारा UT अकाउंट नंबर में पैसा भेजते थे। पता चला कि एक व्यक्ति को 11,000 रु. अकाउंट में डलवाने की सीमा है। 
    
जो मजदूर-मेहनतकश पृष्ठभूमि के लोग थे वह सिर्फ अपने रोजमर्रा की जरूरतों और एसटीडी फोन के लिए (क्योंकि उसका भी अकाउंट से पैसा कटता था) 1000-1500 रुपए डलवा लेते थे। क्योंकि वह काम करते थे इसलिए खाने को बेहतर करने के लिए उनको पैसा नहीं देना पड़ता था। पर जो लोग ठीक-ठाक हैसियत वाले थे। उनमें से कई तो 11,000 रु. की सीमा से कई गुना ज्यादा का खर्च करते थे। इसका इंतजाम वह अन्य काम करने वाले लोगों के अकाउंट में पैसा डलवा कर, उनके न्ज् नंबर से सामान की खरीदारी करते।
    
क्योंकि जेल प्रशासन द्वारा बाहर से किसी तरीके का सामान भेजने की मनाही थी इसलिए अपनी रोजमर्रा की जरूरतों का सामान वहीं से खरीदना होता था। हमने भी जेल में आने के तीन दिन बाद ब्रश और पेस्ट खरीदा और ब्रश किया। ठीक-ठाक हैसियत वाले कैदी तो अपने कपड़े भी धुलवाते थे। इसके लिए वह मेहनतकश पृष्ठभूमि के  कैदी जिन्हें पैसों की जरूरत या अपने परिवार की मदद करने की जरूरत होती थी उन्हें एक व्यक्ति के कपड़े के लिए 1000 रुपए महीना देते थे। हमारे बैरक में दो व्यक्ति, एक जो मैट था यह 8-10 कैदियों के कपड़े धोते थे। इससे कुछ पैसे को वह अपने घर की आर्थिक मदद के लिए भिजवाते थे। 
    
जेल में टीवी देखने पर इस बात का ज्यादा एहसास हुआ कि टीवी के माध्यम से कारपोरेट मीडिया, फिल्में और धारावाहिक कितनी तेजी से लोगों के बीच सांप्रदायिक भेदभाव बढ़ाने में जुटे हैं। 
    
जेल में एसटीडी ही बाहर की सूचनाओं का आदान-प्रदान का एक साधन था। सभी लोगों को अपनी जमानत जिनकी जमानत लगी रहती थी, उनकी जमानत हुई या नहीं हुई या क्या कार्रवाई हुई है इसकी जानकारी फोन से ही प्राप्त होती थी। यदि किसी कैदी की जमानत हो जाती थी तो कैदी तो खुश होता ही था उसके साथ वाले भी खुश होते थे कि चलो अब ये अपने परिवार के साथ रहेगा। न्याय व्यवस्था को लेकर भी लोगों के अंदर काफी आक्रोश था क्योंकि कई लोग 2-3 साल और यहां तक कि 4-5 साल से जेल में थे और अभी तक उनका फैसला नहीं हो पाया था। जिस दिन हमें जमानत मिली उस दिन हमारे ग्रुप वाले तो खुश थे ही अन्य लोग भी खुश थे। 
    
जेल में जो सबसे ज्यादा कमी महसूस हुई वह यह थी कि जेल में आप एक तरह से बाहरी दुनिया से कट से जाते हैं। यह पता नहीं चल पाता था कि देश दुनिया में क्या चल रहा है। वैसे तो टीवी लगे हुए थे और न्यूजपेपर भी आते थे। पर टीवी में कुछ समय ही समाचार चलते थे और उसमें भी या तो सरकार की बढ़ाई करते हुए प्रचारक होते थे या सांप्रदायिक खबरें चलती थीं, न्यूज पेपरों का हाल भी ऐसा ही है। 
    
बाहर के हाल समाचार और देश-दुनिया की गतिविधियों को जानने के लिए हमारे पास तो दो ही साधन थे। एक जब मुलाकात होती थी जो सप्ताह में एक बार होती थी या फिर एसटीडी जिसमें 5 मिनट बात करने का समय मिलता था। जेल प्रशासन ने परिवारजन, पहचान, दोस्तों और वकील से बात करने के लिए एक एसटीडी फोन की सुविधा दी थी। वैसे तो हर दिन 10 मिनट बात करने की छूट थी पर क्योंकि 130-140 लोगों में एक एसटीडी थी इसलिए सिर्फ 5 मिनट की बात करने को मिलती थी और वह भी रोज नहीं हो पाती थी। कई बार नेटवर्क न आने के कारण एसटीडी खराब हो जाती थी और बिना बात किए हुए कई दिन हो जाते थे। कैदी लोग ज्यादा थे। सभी कैदियों के लिए बाहर से संपर्क करने का बस यही एक साधन होता था इसलिए सभी उत्सुकता में अपना नंबर आने की प्रतीक्षा करते थे। इसके लिए जेल प्रशासन ने कैदियों के बीच से ही एक व्यक्ति को मुंशी बनाया हुआ था जो लोगों की बात करवाता था। उसने एक रिश्ता बनाया था जिसमें वह लोगों के नंबर लिखना और लोगों को जिस नंबर से बात करनी होती थी उसे नोट करना था। इसमें भी दबंग लोग बिना नंबर के ही बात कर लेते थे।
    
वैसे तो जेल में एक अस्पताल भी था पर वहां जाना आसान नहीं था। दिन में एक समय अस्पताल जाने का नियम था उसमें भी कैदियों को जाने के लिए चक्कर जाना पड़ता था। जब चक्कर में बैठे हवलदार आपके हाथ में साइन कर देंगे उसके बाद ही आपकी ओपीडी की पर्ची बनेगी। 
    
इसी तरह से जेल में लाइब्रेरी की भी व्यवस्था थी पर वहां जाना बहुत ही मुश्किल था। पहले आपको हवलदार से परमिशन लेनी पड़ती थी। हवलदार वहां जाने के लिए आना कानी करता था। पहले कहा गया कि नहीं। कैदियों को वहां नहीं जाने दिया जाता फिर कुछ दिनों बाद हवलदार ने हमें परमिशन दी तो हम एक तमिल यानी पर्ची बनाकर लाइब्रेरी जा पाए। 50 दिनों में हम सिर्फ एक बार ही लाइब्रेरी जा पाए।
    
अलग-अलग पृष्ठभूमि से होने के बावजूद लगभग सभी कैदियों में जेल प्रशासन के खिलाफ आक्रोश की भावना थी। 
    
जेल में रहकर यह एहसास गहरा गया कि पुलिस प्रशासन दमन के लिए आंदोलनकारियों को जेल में क्यों भेज देता है। एक तो यह है कि जेल में भेज कर तात्कालिक रूप से आंदोलन की गति को मद्धिम किया जा सकता है दूसरा जिसे कैद किया जाए कि आज किया जाता है उसे व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक रूप से इतना पीड़ित किया जाता है कि वह थक-हार जाए और आगे से इस तरह की गतिविधियों में भाग न ले। एक और कारण कि जेल में रखकर उसको समाज से दूर रखा जाए ताकि वह अलगाव में पड़ जाए क्योंकि जेल में आपको बाहर क्या हो रहा है इसकी कोई जानकारी नहीं हो पाती। हमने महसूस किया कि जेल में कई लोग परेशान रहते थे क्योंकि हमारे पास करने के लिए और कुछ काम नहीं था तो हमें काफी समय मिला कि जो हम जानते-समझते हैं उस पर चिंतन मनन किया जाए और बातचीत की जाए। हमें समझ में आया कि सही विचारों पर खड़ा होकर ही प्रशासन के इस दमन से बचा जा सकता है और अपने इरादों को और ज्यादा बुलंद किया जा सकता है। जेल में यह महसूस किया कि शोषण-उत्पीड़न जेल में और क्रूर व निर्मम हो जाता है। जेल में बिल्कुल नई उमर यानी 18 से 22 वर्ष से 30 साल के ज्यादा कैदी हैं यानी जेल के अंदर भी नौजवान पीढ़ी भरी गयी है जो देश के विकास में, समाज को आगे बढ़ाने के लिए योगदान दे सकती थी और यहां से एक और प्रेरणा मिली कि यह समाज अब रहने लायक नहीं है जितना जल्दी हो सके इस दुनिया को बदल डालो।

‘‘ये आँखें हैं तुम्हारी तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर,
इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।’’
-गोरख पाण्डेय

-इंकलाबी मजदूर केन्द्र के जेल गये कार्यकर्ता

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